गांधीजी के आश्रम के 11 व्रत क्यों थे जरूरी? खाने से लेकर रोजमर्रा के जीवन तक जानें नियम

punjabkesari.in Friday, Oct 02, 2026 - 11:04 AM (IST)

Mahatma Gandhi Sabarmati Ashram Rules : राष्ट्रपिता कहे जाने वाले महात्मा गांधी जिन्हें बापू भी कहा जाता है। जब उन्होंन से अहमदाबाद में साबरमती आश्रम की स्थापना की तो उनका बहुत उद्देश्य केवल स्वतंत्रता संग्राम का संचालन करनमा नहीं था, बल्कि एक आदर्श और चरित्रवान इंसान का निर्माण करना भी था। आश्रम में रहने वाले हर एक व्यक्ति और नागरिक को लिए 11 व्रतों का पालन करना बहुत जरूरी था। गांधी का कहन था कि आत्म शुद्धि और समाज सेवा के लिए जीवन में संयम होना बहुत जरूरी है। तो आइए जानते हैं कि गांधी जी के आश्रम के उन 11 व्रतों के बारे में, जो खाने-पीने से लेकर हमारे रोजमर्रा के जीवन को एक नई दिशा देते थे। 

Mahatma Gandhi Sabarmati Ashram Rules

आश्रम के 11 मुख्य व्रत 

अहिंसा- केवल किसी पर शारीरिक हमला न करना ही अहिंसा नहीं है, बल्कि मन, वचन और कर्म से किसी का दिल न दुखाना ही असली अहिंसा है।

सत्य-गांधीजी के लिए 'सत्य ही ईश्वर' था। हर परिस्थिति में सत्य बोलना और सत्य के मार्ग पर चलना जीवन का सबसे बड़ा नियम था।

अस्तेय- बिना अनुमति किसी की वस्तु न लेना। गांधीजी के अनुसार, आवश्यकता से अधिक किसी चीज का उपयोग करना भी एक प्रकार की चोरी ही है।

Mahatma Gandhi Sabarmati Ashram Rules

ब्रह्मचर्य- इंद्रियों पर नियंत्रण रखना। केवल शारीरिक संयम ही नहीं, बल्कि विचारों में पवित्रता और अनुशासन बनाए रखना।

असंग्रह- आवश्यकता से अधिक धन, वस्तुएं या संपत्ति जमा न करना। जितनी जरूरत हो, केवल उतना ही रखना ताकि दूसरों के हिस्से का नुकसान न हो।

शरीरश्रम- रोटी के लिए श्रम अनिवार्य था। आश्रम का हर व्यक्ति चाहे वह कितना भी बड़ा नेता क्यों न हो- झाड़ू लगाने, कताई करने और बर्तन धोने जैसे काम खुद करता था।

Mahatma Gandhi Sabarmati Ashram Rules

अस्वाद - खान-पान का नियम बहुत कड़ा था। भोजन केवल शरीर को स्वस्थ रखने के लिए खाया जाता था, स्वाद के लिए नहीं। मिर्च-मसाले और अधिक तेल-घी से दूर रहकर सात्विक भोजन लिया जाता था।

अभय यानी निर्भयता- किसी भी परिस्थिति में डरना नहीं। न ईश्वर के अलावा किसी मनुष्य से डरना और न ही अपने विचारों को रखने में हिचकिचाना।

सर्वधर्म समानता- आश्रम में सभी धर्मों  के प्रति समान आदर भाव रखा जाता था। रोज की प्रार्थना में सभी धर्मों के श्लोक और बातें शामिल होती थीं।

स्वदेशी- अपने देश और आसपास बने सामान का ही उपयोग करना। खादी पहनना और स्थानीय कारीगरों को बढ़ावा देना इसी व्रत का हिस्सा था।

अस्पृश्यता निवारण- छुआछूत का पूरी तरह अंत। गांधीजी का स्पष्ट नियम था कि आश्रम में जाति, धर्म या वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा।

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Content Editor

Sarita Thapa

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