23 सितंबर को ही क्यों मनाया जाता है अंतर्राष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस? जानें इसका इतिहास और खासियत

punjabkesari.in Monday, Sep 21, 2026 - 11:02 AM (IST)

International Day Of Sign Languages : क्या आपने कभी बिना एक भी शब्द बोले अपने दोस्त को कोई बात समझाई है? शायद हाथ के इशारे से, चेहरे के भाव से या सिर हिलाकर। हम सभी कभी-कभी इशारों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन सांकेतिक भाषा में हाथों, उंगलियों, चेहरे के भाव और शरीर की गतिविधियों के जरिए पूरी तरह से विचार और भावनाएं व्यक्त की जाती हैं। यह सिर्फ इशारों का खेल नहीं, बल्कि अपनी व्याकरण और नियमों वाली एक पूरी प्राकृतिक भाषा है। हर साल 23 सितम्बर को अंतर्राष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य सांकेतिक भाषाओं के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना और बधिर लोगों के अधिकारों, शिक्षा तथा समाज में उनकी भागीदारी को बढ़ावा देना है। संयुक्त राष्ट्र ने 23 सितम्बर को यह दिवस घोषित किया था और पहली बार यह दिवस 2018 में मनाया गया।

International Day Of Sign Languages

क्यों चुना गया 23 सितम्बर?
इस तारीख का एक खास इतिहास है। 23 सितम्बर 1951 को रोम, इटली में विश्व बधिर संघ की स्थापना हुई थी। इसी संस्था के प्रयासों से सांकेतिक भाषाओं और बधिर समुदाय के अधिकारों को दुनिया भर में आवाज मिली इसलिए संयुक्त राष्ट्र ने 23 सितम्बर को ही ‘अंतर्राष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस’ के लिए चुना। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसम्बर, 2017 में इस दिवस को आधिकारिक रूप से मान्यता दी। इसका पहला आयोजन 23 सितम्बर, 2018 को हुआ।

सांकेतिक भाषा का इतिहास कितना पुराना है?
सांकेतिक भाषा का इतिहास किसी एक व्यक्ति या एक देश से शुरू नहीं होता। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बधिर लोग सदियों से हाथों और शरीर के संकेतों के जरिए संवाद करते रहे हैं। समय के साथ अलग-अलग समुदायों में उनकी अपनी सांकेतिक भाषाएं विकसित हुईं। यूरोप में 18वीं शताब्दी के दौरान बधिर बच्चों की शिक्षा के लिए व्यवस्थित प्रयास तेज हुए। फ्रांस में अबे शार्ल-मिशेल द ल’एपे ने बधिर विद्यार्थियों की शिक्षा में संकेतों के इस्तेमाल को व्यवस्थित रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके प्रयासों से पैरिस में बधिर बच्चों के लिए एक विद्यालय विकसित हुआ। आगे चलकर बधिर शिक्षा और सांकेतिक भाषाओं के विकास को इससे महत्वपूर्ण गति मिली।

दुनिया में सिर्फ एक सांकेतिक भाषा नहीं!
यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि पूरी दुनिया में 300 से अधिक अलग-अलग सांकेतिक भाषाएं इस्तेमाल की जाती हैं। यानी जिस तरह हिंदी, अंग्रेजी, फ्रैंच और जापानी अलग-अलग भाषाएं हैं, उसी तरह अलग-अलग देशों और समुदायों की सांकेतिक भाषाएं भी अलग हो सकती हैं। मसलन, अमेरिकन साइन लैंग्वैज और ब्रिटिश साइन लैंग्वेज एक जैसी नहीं हैं। यहां तक कि एक ही देश में भी अलग-अलग समुदायों में संकेतों के इस्तेमाल में अंतर हो सकता है।

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क्या सांकेतिक भाषा सिर्फ हाथों से बनती है?
नहीं! इसमें हाथों की स्थिति, उंगलियों की गति, चेहरे के भाव, शरीर की मुद्रा और दिशा भी महत्वपूर्ण होती है। एक छोटा-सा बदलाव किसी संकेत का अर्थ बदल सकता है। इसलिए सांकेतिक भाषा सीखना कुछ इशारे याद कर लेना नहीं है। इसमें शब्दों जैसे वाक्य बनाने के नियम और अपनी व्याकरण भी होती है। संयुक्त राष्ट्र भी सांकेतिक भाषाओं को पूरी तरह विकसित प्राकृतिक भाषाओं के रूप में मान्यता देता है।

कुछ रोचक तथ्य
7 करोड़ से अधिक : विश्व बधिर संघ के अनुसार दुनिया में 7 करोड़ से अधिक बधिर लोग हैं और वे 300 से ज्यादा सांकेतिक भाषाओं का इस्तेमाल करते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय संकेत भी हैं : अलग-अलग देशों के लोग जब अंतर्राष्ट्रीय बैठकों या यात्राओं में मिलते हैं, तो एक सीमित रूप वाली इंटरनैशनल साइन का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह किसी एक देश की राष्ट्रीय सांकेतिक भाषा नहीं है।

भाषा और संस्कृति दोनों : सांकेतिक भाषा केवल बातचीत का माध्यम नहीं, बल्कि बधिर समुदाय की पहचान और संस्कृति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

शिक्षा में बड़ी भूमिका : सांकेतिक भाषा तक पहुंच मिलने और सांकेतिक भाषा में अच्छी शिक्षा उपलब्ध होने से बधिर बच्चों के विकास और सीखने में महत्वपूर्ण मदद मिलती है।

हम क्या कर सकते हैं?
बच्चे चाहें तो कुछ सामान्य सांकेतिक संकेत सीखकर शुरुआत कर सकते हैं और अपने स्कूल में बधिर साथियों के साथ संवाद के नए रास्ते बना सकते हैं। सबसे जरूरी है कि हम सांकेतिक भाषा को केवल ‘इशारों’ के रूप में न देखें, बल्कि एक वास्तविक भाषा और बधिर समुदाय की महत्वपूर्ण पहचान के रूप में समझें।

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Content Editor

Sarita Thapa

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