Sawan 2021 : यहां श्री राम ने खर-दूषण का वध करने के बाद की थी लक्ष्मेश्वर महादेव की स्थापना

2021-07-28T13:37:23.24

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25 जुलाई से श्रावण का मास आरंभ हो चुका है। यूं तो भगवान शंकर के भक्त पूरे वर्ष ही उनकी भक्ति में लीन रहते हैं, परंतु जैसे ही सावन का मास आता है उनकी भक्ति की सीमा चरम पर पहुंच जाती है। इस दौरान शिवभक्त मंदिरों में जाकर विभिन्न प्रकार से भोलेनाथ का व उनके लिंग स्वरूप यानि शिवलिंग का विधिवत पूजन करते हैं। बता़या जाता है कि देशभर में भगवान शंकर के 12 ज्योतिर्लिंग स्थापित है। जिनकी पूजा का अधिक महत्व है। तो वहीं इसके अलावा भी भोलेनाथ के ऐसे कई प्राचीन मंदिर हैं जिनकी सावन के महीने में खास रूप से पूजा अर्चना की जाती है। आपको भगवान शंकर के कैसे ही मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं जो लक्ष्मेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है।


दरअसल यह मंदिर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग सवा सौ किलोमीटर की दूरी पर खरौद नगर में स्थापित है। जिसे लक्ष्मेश्वर महादेव मंदिर के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त है। बताया जाता है कि यह प्राचीन शिव मंदिर छत्तीसगढ़ के 5 ललित कला केंद्रों में से एक है। तो वहीं इस नगर को मोक्ष ढायी नगर का दर्जा प्राप्त होने के कारण इसे छत्तीसगढ़ का काशी भी कहा जाता है। मंदिर से जुड़ी कथाओं के अनुसार इस मंदिर की स्थापना श्री राम ने खर दूषण को मारने के बाद भ्राता लक्ष्मण जी के कहने पर की थी जिस कारण इस मंदिर का नाम लक्ष्मेश्वर महादेव मंदिर पड़ा।


बता दे इस मंदिर परिसर के गर्भ गृह में एक प्राचीन शिवलिंग है जिसके बारे में कहा जाता है कि इसकी स्थापना स्वयं लक्ष्मण जी ने की थी। इस शिवलिंग की खास बात की है कि इस में एक लाख छिद्र है। जिनमें से एक छिद्र ऐसा माना जाता है जो पताल तक जाता है। लोक मान्यता के अनुसार इस शिवलिंग पर कितना भी जस चढ़ाया जाए वो उसके अंदर समा जाता है परंतु केवल एक चित्र ऐसा है जिसमें हमेशा पानी भरा रहता है। इसी कारण से इसे अक्षय कुंड के नाम से भी जाना जाता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार लक्ष लिंग भी कहा गया है।

यहां के लोगों द्वारा बताया जाता है कि लक्ष्य लिंग पर अभिषेक किया गया जल मंदिर के पीछे कुंड में जाता है जिसके चलते यह कुंड कभी भी सूखा नहीं पड़ता। कहा जाता है लक्ष्मण जमीन से लगभग 30 फीट ऊपर है, इसे स्वयंभू लिंग भी माना जाता है।


इस मंदी से जुड़ी अन्य खास बात यह है कि यह मंदिर नगर के प्रमुख देव के रूप में पश्चिम दिशा में स्थापित है मंदिर के चारों ओर पत्थर की मजबूत दीवारें बनी हुई है जिसके अंदर लगभग 10 फीट लंबा और 48 फीट चौड़ा चबूतरा है। वही इसके ऊपर 30 फुट व्यास की गोलाई में मंदिर है। चबूतरे के ऊपरी भाग को परिक्रमा कहा जाता है। इसके अलावा गृह गृह में विशिष्ट शिवलिंग स्थापित है। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि खासतौर पर सावन मास में और महाशिवरात्रि के दौरान यहां पर भव्य मेले का आयोजन किया जाता है।


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Content Writer

Jyoti

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