Kalighat Kali Mandir: कोलकाता के कालीघाट में दीपावली पर महालक्ष्मी बनती हैं मां काली, गुप्त पूजा में पुजारी आंखों पर बांधते हैं पट्टी, जानें अलक्ष्मी विदाई का रहस्य

punjabkesari.in Thursday, Oct 22, 2026 - 07:58 AM (IST)

कालीघाट शक्तिपीठ: जहां दीपावली पर मां काली बनती हैं महालक्ष्मी
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में स्थित ऐतिहासिक कालीघाट मंदिर अपनी अनूठी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। सामान्य दिनों में सोने की जीभ वाली मां काली के रूप में पूजी जाने वाली देवी की प्रतिमा को दुर्गा पूजा में चामुंडा और दीपावली पर महालक्ष्मी के रूप में पूजा जाता है। दीपावली के दिन मां काली के गर्भगृह में अलग से लक्ष्मी जी की प्रतिमा नहीं रखी जाती, बल्कि मूल काली प्रतिमा का ही महालक्ष्मी रूप में विशेष स्नान और श्रृंगार किया जाता है।

बक्से में बंद सती का अंग: आंखों पर पट्टी बांधकर पुजारी करते हैं गुप्त स्नान
कालीघाट मंदिर में माता सती के पैर की उंगलियों के अवशेष को देवी की मूल शक्ति माना जाता है, जिसे मुख्य प्रतिमा के नीचे एक सुरक्षित बक्से में रखा गया है। आम श्रद्धालुओं के लिए इस अवशेष के दर्शन वर्जित हैं। साल में केवल एक बार, पुरी के जगन्नाथ मंदिर की स्नान यात्रा के समय, इस बक्से को विशेष पूजा के लिए खोला जाता है। इस अनुष्ठान के दौरान पुजारी परिवार के चुनिंदा सदस्य अपनी आंखों पर कपड़ा/पट्टी बांधकर बक्से से अवशेष को बाहर निकालते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस पवित्र अवशेष को देखना मना है, इसलिए स्नान कराने वाले पुजारी भी इसे बिना देखे पवित्र जल से स्नान कराते हैं, नए वस्त्र में लपेटते हैं और वापस सुरक्षित रख देते हैं।

दीपावली की शाम अलक्ष्मी विदाई और पाटकाठी जलाने का अनूठा रिवाज
दीपावली पर कालीघाट में विशेष पूजा आधी रात के बजाय शाम के समय आयोजित की जाती है। पूजा शुरू होने से पहले मंदिर परिसर में अलक्ष्मी विदाई की रस्म निभाई जाती है। इस दौरान सेवादार जलती हुई पाटकाठियां (पटसन के सूखे डंठल) लेकर पूरे मंदिर की परिक्रमा करते हैं और फूस से बनी अलक्ष्मी की आकृति को जलाते हैं। मान्यता है कि इस रस्म से घर-परिवार और मंदिर परिसर से दरिद्रता तथा दुर्भाग्य दूर होता है। इसके बाद मंदिर की संपूर्ण सफाई की जाती है।

गर्भगृह में भगवान वासुदेव की उपस्थिति और वैष्णव तिलक
कालीघाट केवल शक्ति पूजा का केंद्र नहीं है, बल्कि यहां शक्ति और वैष्णव परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। गर्भगृह के एक आले में भगवान वासुदेव की प्रतिमा स्थापित है और मां काली की नाक पर वैष्णव तिलक लगाया जाता है। परंपरा के अनुसार पहले वासुदेव को नैवेद्य चढ़ाया जाता है, जिसके बाद देवी को भोग अर्पित होता है। इसके अलावा मंदिर परिसर में स्थित 'श्यामराय मंदिर' में राधा-कृष्ण की आराधना होती है, जहां उनके लिए अलग से शाकाहारी रसोई बनी हुई है।

आम दिनों में आमिष भोग, लेकिन दीपावली पर पूर्ण सात्विक प्रसाद
सामान्य दिनों में कालीघाट मंदिर में देवी को चावल, दाल, सब्जियों के साथ-साथ रोहू, हिलसा मछली, झींगा और बकरे के मांस का भोग लगाया जाता है। मंदिर के नाटमंदिर के पास 'हरकाठ तला' पर बकरे की बलि की परंपरा है और उसका मांस भोग में शामिल किया जाता है परंतु, दीपावली की रात को देवी को केवल सात्विक/शाकाहारी भोग चढ़ाया जाता है। दीपावली की विशेष पूजा के बाद देवी को खील, मुरमुरे, लड्डू, पूरी, सब्जी, फल और मिठाइयों का भोग अर्पित किया जाता है। दोपहर में भोजन भोग के समय गर्भगृह के कपाट बंद रहते हैं और इस दौरान जरूरतमंदों को दरिद्रनारायण सेवा के तहत भोजन कराया जाता है।

'पालादार' व्यवस्था और कलकत्ता हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
कालीघाट मंदिर में पूजा-सेवा का अधिकार पीढ़ियों से हलदार परिवार के सेवायतों के पास है। यहां पूजा की बारी को 'पाला' और जिम्मेदारी संभालने वाले को 'पालादार' कहा जाता है। पालादार उस दिन के पूजा, श्रृंगार, फूल, तेल, घी और भोग का पूरा खर्च उठाता है तथा पुजारियों व रसोइयों की व्यवस्था करता है। वर्ष 2013 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने फैसला दिया था कि कोई भी सेवायत या पालादार अपना पूजा का अधिकार परिवार से बाहर किसी अन्य व्यक्ति को बेच या हस्तांतरित नहीं कर सकता।

स्वामी विवेकानंद और कालीघाट का ऐतिहासिक संबंध
कालीघाट मंदिर से कई महापुरुषों की आस्था जुड़ी रही है। स्वामी विवेकानंद ने अपनी माता की मन्नत पूरी करने के लिए कालीघाट मंदिर की सात परिक्रमाएं की थीं और यहां स्वयं हवन अनुष्ठान संपन्न किया था।

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Content Writer

Niyati Bhandari

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