Jyeshtha Gauri Vrat 2026: कब है ज्येष्ठा गौरी व्रत? जानें 3 दिवसीय महापर्व की सही तिथियां, शुभ मुहूर्त और संपूर्ण पूजन विधि
punjabkesari.in Wednesday, Sep 16, 2026 - 11:24 AM (IST)
Jyeshtha Gauri Vrat 2026: सनातन धर्म और विशेष रूप से महाराष्ट्र की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा में ज्येष्ठा गौरी व्रत का विशेष धार्मिक व आध्यात्मिक महत्व है। धन, शांति और अखंड सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी गौरी (माता पार्वती) को समर्पित यह तीन दिवसीय महापर्व हर घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा लेकर आता है। वर्ष 2026 में यह पावन उत्सव 17 सितंबर (गुरुवार) से शुरू होकर 19 सितंबर (शनिवार) तक अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। यदि आप भी इस पावन पर्व पर मां गौरी का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं, तो आइए जानते हैं इन तीन दिनों का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि।

पहला दिन: ज्येष्ठा गौरी आवाहन (17 सितंबर 2026, गुरुवार) 17 सितंबर को शाम 7:52 बजे से पूर्व शुभ समय रहेगा।
दूसरा दिन: ज्येष्ठा गौरी महापूजन (18 सितंबर 2026, शुक्रवार)
तीसरा दिन: ज्येष्ठा गौरी विसर्जन (19 सितंबर 2026, शनिवार) सुबह 6:27 बजे से लेकर शाम 6:38 बजे तक विसर्जन का शुभ मुहूर्त है।
भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी पर देवी ज्येष्ठा गौरी का आवाहन कर गणेश के समीप उनकी स्थापना करने का विधान है। शास्त्रों ने गौरी को गणेश की मां व लक्ष्मी की बड़ी बहन कहा है। इसी कारण इन्हें ज्येष्ठा कहते हैं। पद्मपुराण के अनुसार समुद्र मंथन में हलाहल विष निकलने के बाद देवी ज्येष्ठा की उत्पत्ति हुई थी। लाल रंग के कपड़ों से सुसज्जित देवी के चार हाथ हैं, एक में अभय मुद्रा, दूसरे में वर मुद्रा, तीसरे में तीर व चौथे में धनुष है। इनका वाहन कौआ है। यह सदा कमल पर विराजती हैं। इनका निवास पीपल है। शास्त्रों ने इन्हें धूमावती, अलक्ष्मी व ज्येष्ठा भी कहा है। ये पाप, आलस, दुख, कुरूपता पर आधिपत्य रखती हैं।

ज्येष्ठा गौरी पूजन विधि: घर की उत्तर दिशा में नीला कपड़ा बिछाकर उस पर स्टील का लोटा रख कर उसमें जल, दूध, तिल, सिक्के व सुपारी डालें व लोटे पर पीपल के पत्ते रखकर उस पर नारियल रखें। ज्येष्ठा गौरी कलश की स्थापना कर विधिवत पूजन करें। सरसों के तेल का दीपक करें, लोहबान से धूप करें, सिंदूर से तिलक करें, नीले फूल चढ़ाएं व उड़द के हलवे का भोग लगाएं तथा नारियल मिश्री का फलाहार चढ़ाएं। रुद्राक्ष की माला से 108 बार यह विशेष मंत्र जपें। पूजन के बाद भोग प्रसाद स्वरूप सभी में वितरित करें।
मंत्र: ह्रीं ज्येष्टायै नमः॥
विदाई परंपरा: प्रातः काल माता की विशेष आरती कर सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। इसके पश्चात भक्त ढोल-ताशों, संगीत और नृत्य के साथ माता की प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जाते हैं तथा पवित्र जल-स्रोतों में विसर्जित कर इस महापर्व का समापन करते हैं।
