Paryushan Mahaparva: सांसारिक भागदौड़ से थमी जिंदगी को आत्मा से जोड़ने का पावन अवसर है 8 दिवसीय साधना पर्युषण महापर्व, जानिए इसका आध्यात्मिक रहस्य
punjabkesari.in Wednesday, Sep 09, 2026 - 11:16 AM (IST)
‘पर्युषण महापर्व’ (8 से 15 सितम्बर) पर विशेष: सांसारिक जीवन की आपाधापी, भौतिक आकर्षणों की अंधी दौड़ और मानसिक तनाव के बीच जैन धर्म का पवित्र 'पर्युषण महापर्व' मनुष्य को कुछ पल ठहरकर अपने भीतर झांकने का दुर्लभ अवसर प्रदान करता है। 8 से 15 सितम्बर तक चलने वाला यह महापर्व केवल बाह्य आडंबर, कर्मकांड या उपवास तक सीमित धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह आत्मा के विकारों को धोकर उसे शुद्ध करने की एक गहन आध्यात्मिक यात्रा है।

वर्षभर धन, पद और सुख-सुविधाओं के पीछे भागता हुआ मनुष्य जब पर्युषण के पावन दिनों में धर्म, ध्यान, स्वाध्याय और संयम की शरण में आता है, तो उसे अहसास होता है कि जीवन का असली ध्येय केवल भौतिक उपलब्धियां हासिल करना नहीं, बल्कि आत्म-कल्याण और मन की शांति प्राप्त करना है।
पर्युषण महापर्व जैन धर्म का अत्यंत पवित्र और आत्मशुद्धि का पर्व है, जो 8 सितम्बर से शुरू हो गया है। यह केवल 8 दिनों तक चलने वाला धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि आत्म कल्याण, आत्मचिंतन और आत्मसुधार की यात्रा है। इन दिनों मनुष्य बाहरी दुनिया की भागदौड़ से कुछ समय विराम लेकर अपने भीतर झांकने का प्रयास करता है।
जैन धर्म में पर्युषण महापर्व का विशेष महत्व है। यह पर्व मनुष्य को अपने जीवन की दिशा पर विचार करने, आत्मा में जमे विकारों को दूर करने और संयम के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। वास्तव में पर्युषण बाहरी आडंबर का नहीं, बल्कि अंतरात्मा को निर्मल बनाने का पर्व है।
पूरे वर्ष मनुष्य संसार की भागदौड़ में धन, प्रतिष्ठा, परिवार और सुख-सुविधाओं को पाने में व्यस्त रहता है। इसी व्यस्तता में वह स्वयं को भूल जाता है। पर्युषण उसे याद दिलाता है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल भौतिक उपलब्धियां हासिल करना नहीं, बल्कि अपनी आत्मा का कल्याण करना भी है।
इन 8 दिनों में धर्म, तप, स्वाध्याय, ध्यान, सामायिक और संयम के माध्यम से व्यक्ति स्वयं का मूल्यांकन करता है। वह विचार करता है कि उससे जाने-अनजाने में किसका दिल दुखा, किसके प्रति कटुता रखी और किन बुराइयों ने उसके जीवन में स्थान बना लिया। यह आत्मचिंतन ही पर्युषण की सबसे बड़ी विशेषता है।
पर्युषण हमें क्रोध को क्षमा में, अहंकार को विनम्रता में, लोभ को संतोष में और दुर्भावना को मैत्री में बदलने की प्रेरणा देता है। मनुष्य जब दूसरों की गलतियां गिनने के बजाय अपनी कमियों को देखना शुरू करता है, तभी आत्मशुद्धि की वास्तविक प्रक्रिया आरंभ होती है।
पर्युषण पर्व का सबसे सुंदर संदेश है क्षमा। वर्षभर में जाने-अनजाने किसी को दुख पहुंचा हो, कटु वचन बोले हों या मन में किसी के प्रति दुर्भावना आई हो, तो उसका त्याग करने का संकल्प लिया जाता है। क्षमा मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मबल का परिचायक है। अपने मन से वैर, ईर्ष्या और दुर्भावना को निकालकर सभी जीवों के प्रति मैत्री भाव रखना ही पर्युषण की सच्ची आराधना है।
यह अवसर हमें यह संकल्प लेने का संदेश देता है कि पर्व समाप्त होने के साथ धर्म समाप्त न हो। मंदिर में बिताए समय और प्रवचनों से मिले संदेश को अपने व्यवहार का हिस्सा बनाना ही पर्युषण की सार्थकता है।
पर्युषण हमें स्वयं से मिलने का अवसर देता है। यदि इन दिनों में हम अपने भीतर का एक भी विकार कम कर सकें, किसी एक व्यक्ति से सच्चे मन से क्षमा मांग सकें और किसी एक जीव के प्रति करुणा बढ़ा सकें, तो यही हमारे लिए वास्तविक आत्म कल्याण की दिशा में बड़ा कदम होगा। इन दिनों व्यक्ति अपने जीवन में हुई भूलों, क्रोध, मान, माया, लोभ और कटु व्यवहार का आत्मनिरीक्षण करता है।
जैन परंपरा में पर्युषण के दौरान धर्म आराधना, स्वाध्याय, सामायिक, प्रतिक्रमण, तप और संयम पर विशेष जोर दिया जाता है। व्यक्ति अपनी इच्छाओं को सीमित करने और इंद्रियों पर नियंत्रण पाने का प्रयास करता है।

पर्युषण हमें क्या सिखाता है?
-क्रोध पर क्षमा की विजय,
-अहंकार पर विनम्रता की विजय,
-लोभ पर संतोष की विजय,
-मोह पर आत्मज्ञान की विजय,
-कटुता पर मधुरता की विजय व
-भौतिक आकर्षण पर आध्यात्मिक चिंतन की विजय।
सच्चा पर्युषण मंदिर या उपासरे जाने, पूजा करने या उपवास करने तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है कि हम अपने व्यवहार में परिवर्तन लाएं। जिस व्यक्ति से वर्षों से मनमुटाव है, उसे क्षमा कर दें; जिस व्यक्ति को हमने दुख दिया है, उससे क्षमा मांग लें और भविष्य में वही गलती न दोहराने का संकल्प लें।
पर्युषण आत्मा की सफाई का अवसर है। जिस तरह घर की सफाई से वातावरण स्वच्छ होता है, उसी तरह क्षमा, संयम और आत्मचिंतन से मन और आत्मा निर्मल होती है।

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