गुरुदेव श्री श्री रविशंकर- अशांत समय में शांत कैसे रहें?

punjabkesari.in Thursday, Sep 17, 2026 - 01:32 PM (IST)

International Day of peace 2026: शांति हमारे भीतर की वह अवस्था है जिसमें शरीर, मन और आत्मा परस्पर समरसता में होते हैं। अपने परिवेश, अपने लोगों और समाज के साथ सामंजस्य में रहना भी शांति ही है। अंततः शांति का अर्थ है, समूचे वातावरण और ब्रह्मांड के साथ एकात्म भाव में होना। इसीलिए हम तीन बार कहते हैं—ॐ शांति, शांति, शांति—अर्थात भीतर शांति, वातावरण में शांति और ब्रह्मांड में शांति।

किंतु शांति का अर्थ निष्क्रियता या आत्मसंतोष नहीं है। कई लोग शांति को ढीले-ढाले ढंग से जीवन जीने, परिस्थितियों को चुपचाप स्वीकार कर लेने या उदासीन बने रहने से जोड़ देते हैं। वे शांति को निष्क्रियता और आक्रामकता को सक्रियता समझ बैठते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि अन्याय के सामने हम निष्क्रिय हुए बिना शांति को अपने आचरण में धारण करें।

संघर्ष से बचने की आवश्यकता नहीं है, सत्य बोलिए। किंतु सत्य बोलते समय आक्रामक या असभ्य होने की भी आवश्यकता नहीं। दृढ़ रहें, परंतु करुणा और सौम्यता के साथ। यदि कभी आपका धैर्य छूट भी जाए, तो शीघ्र ही अपने केंद्र में लौट आइए। आपका क्रोध जल की सतह पर खींची गई रेखा की तरह हो, एक क्षण के लिए दिखाई दे और अगले ही क्षण विलीन हो जाए। उस घटना से सीख लीजिए और आगे बढ़ जाइए।

कमल के समान बनिए। वह कीचड़ भरे सरोवर में खिलता है, फिर भी कीचड़ उसे स्पर्श नहीं कर पाती। कमल का पत्ता जल पर टिका रहता है, किंतु जब उस पर जल की एक बूंद गिरती है, तो वह उससे चिपकती नहीं। मोती की भांति उस पर ठहरती है। उसी प्रकार इस संसार में रहते हुए भी उससे आसक्त न हों। संसार में पूरी तरह उपस्थित रहें, किंतु भीतर से अनासक्त। जब आप संघर्ष और द्वंद्व को स्वीकार कर उसके साथ सहज होकर रहना सीख लेते हैं, तो संघर्ष धीरे-धीरे स्वयं ही विलीन होने लगता है।

प्रायः प्रत्येक विवाद के दो पक्ष होते हैं और दोनों को विश्वास होता है कि वही सही हैं। यदि आप वास्तव में ध्यानपूर्वक सुनें, तो पाएंगे कि दोनों पक्षों की बात में कुछ न कुछ सार अवश्य है। किंतु शांति के लिए केवल सही सिद्ध होना पर्याप्त नहीं। विश्वास का निर्माण, अपनत्व की भावना और संवाद के लिए स्थान आवश्यक है। संवाद का टूटना ही अक्सर विवाद को जन्म देता है और जब दोनों पक्ष अपनी-अपनी धारणाओं पर अड़े रहते हैं, तो विवाद और गहरा जाता है। संघर्ष के समाधान के लिए दोनों पक्षों को अपने मतभेदों से ऊपर उठकर व्यापक परिप्रेक्ष्य को देखना होगा।

यहीं मध्यस्थता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। नेतृत्व करने वाले और सत्ता में बैठे लोगों के लिए आंतरिक शांति और स्थिरता का विकास विशेष रूप से आवश्यक है। भीतर की शांति उन्हें परिस्थितियों को स्पष्टता से समझने और समष्टि के हित में विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करती है।

जैन दर्शन में एक अत्यंत सुंदर सिद्धांत है, स्यादवाद, अर्थात् ‘शायद’ या ‘संभवतः’ का सिद्धांत। सत्य यह है कि इस संसार में सब कुछ अनिश्चित है, फिर भी हम ऐसे जीते हैं मानो सब कुछ निश्चित हो।

निश्चितता का आग्रह और स्वयं को ही पूर्णतः सही मानने की प्रवृत्ति क्रोध को जन्म देती है। जब परिस्थितियां हमारी अपेक्षा के अनुरूप नहीं होतीं, तो हम विचलित हो उठते हैं लेकिन जब हम अनिश्चितता को स्वीकार कर लेते हैं, तो क्रोध और हिंसा के बंधन से मुक्त होने लगते हैं। तब हम किसी एक कठोर परिणाम से चिपके रहने के बजाय संभावनाओं में विश्वास करना सीखते हैं। जीवन जब हमारी अपेक्षा के अनुसार नहीं चलता, तब यही दृष्टिकोण हमें संतुलित बनाए रखता है।

निश्चितता हमें सुरक्षा और सुविधा का अनुभव देती है, किंतु अनिश्चितता जीवन में रोमांच भर देती है। वही हमें भीतर से जाग्रत करती है, सृजनशीलता को प्रज्वलित करती है, श्रद्धा को गहरा करती है और हमारी सहनशीलता तथा जिजीविषा को सुदृढ़ बनाती है।

उथल-पुथल संसार का स्वभाव है, किंतु शांति हमारी आत्मा का स्वभाव है। जब हम संकल्प और कुशलता के साथ अपनी शांति में स्थित रहते हैं, तो भीतर की यह निस्तब्धता धीरे-धीरे बाहर भी प्रस्फुटित होने लगती है और हमारे आसपास की अशांति को शांत करने लगती है। इसलिए संकल्प लीजिए, भीतर से स्थिर और शांत रहना है, बाहर से गतिशील और सजग रहना है। तब आप न केवल स्वयं शांति में स्थापित रहेंगे, बल्कि अपने आसपास के जीवन में भी शांति का संचार कर सकेंगे।

 


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Content Writer

Niyati Bhandari

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