आसुरिक सोच का जीवन में क्या प्रभाव पड़ता है ? जानें गीता का गहरा संदेश
punjabkesari.in Saturday, May 23, 2026 - 01:14 PM (IST)
Bhagavad Gita Spiritual Lessons : वेद सृष्टि का असीम ज्ञान हैं । इनमें निहित तथ्य उतने ही वैज्ञानिक और तार्किक हैं जितने वे प्राचीन और पारंपरिक हैं! वैदिक संस्कृति में समाज को सम्प्रदाय, क्षेत्र, जन्म, रंग-रूप अथवा प्रतिष्ठा के बल पर विभाजित नहीं किया जाता था, ये सभी आधुनिक संकल्पनाएं हैं । अलग-अलग वैदिक ऋषियों ने मानव जाती का दैविक (सभ्य) और आसुरिक (असभ्य) प्रवृत्तियों में वर्गीकरण किया, और ये वर्ग सभी संस्कृतियों और सम्प्रदायों में उपस्थित हैं, यहां तक की एक ही जीव में अलग अलग समय और स्थिति में ये दोनों ही प्रवृत्तियां देखने को मिलती हैं ।
द्वौ भूतसर्गो लोकेअस्मिन्दैव आसुर एव च । दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरम पार्थ मे शृणु ॥ भगवद गीता १६.६ ॥
भगवान् कृष्ण असुरों के गुणों का अवलोकन करते हुए कहते हैं कि संसार में दो ही प्रकार के जन होते हैं - पहले वे जिनकी प्रवृत्ति दैविक है और दुसरे वे जिनमें आसुरिक प्रवृत्ति प्रबल होती है ।
आसुरिक प्रवृत्ति के लोगों में विवेक शक्ति, सदाचार और सत्य का अभाव होता है। उनकी विचारधारा विनाशकारी होती है। अन्य जीव जंतुओं को कष्ट व पीड़ा पहुंचाना, किसी पर अन्याय होते देख मुंह फेर लेना- ये असुरों के ही लक्षण हैं। ऐसे लोग स्वयं के लिए जीते हैं तथा पाखंड, घमंड व अक्खड़पन से युक्त होते हैं। सुबह श्याम इन्द्रियों के धभोगों का सेवन करने वाले ये असुरजन स्थूल को ही अंतिम सत्य मान बैठते हैं। वे अधिक से अधिक धन अर्जित करने के नित नए उपाय करते हुए अपना संपूर्ण जीवन धन संशय में ही निकाल देते हैं। ऐसे जन दान और सेवा कार्य भी मात्र दिखावे के लिए ही करते है । गीता के अनुसार, ऐसे मनुष्य पतन चक्र में फंसकर, कष्टदायी जन्मों और नरकों की ओर प्रस्थान करते हैं ।
यदि आप अपने आस पास हो रहे मानव व पशु शोषण, लूट-मार और धोकाधड़ी पर नज़र डालें, तोह आपको ज्ञात होगा की आधुनिक काल के मानवों पर आसुरिक वृत्ति हावी है। अध्यामत्मिकता के नाम पर नाच-गाना और नाश करना भी असुरों के ही लक्षण हैं। जिस प्रकार मंदिर में बैठ कर किया जाने वाला पाप, पुण्य नहीं बन जाता, उसी प्रकार सत्संग में उद्दंडता के प्रदर्शन करने से वह दैविक नहीं हो जाती। नाच-गाना और मौज मानाने में कोई बुराई नहीं है यदि उसके साथ साथ जन-कल्याण के लिए दान-पुण्य के कार्य भी उतनी ही तीव्रता से किये जाएं। जो लोग सृष्टि के कल्याण के कार्यों में सलग्न रहते हैं, सुख समृद्धि प्राप्त करते हैं । और जो लोग सृष्टि के नाश में भागीदार बनते हैं, स्वयं के लिए नरक के द्वार खोल लेते हैं । जानवरों पर हिंसा का करना नरक का सीधा रास्ता है। सभी धर्म कर्म की नीति का समर्थन करते हैं । इस नीति का प्रयोग अपने हित के लिए कीजिये, सद्कर्मों द्वारा।
अश्विनी गुरुजी ध्यान आश्रम
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