कर्तव्य बड़ा या मानवता ? जानें कैसे आचार्य नागार्जुन के एक फैसले ने बदल दी सफलता की परिभाषा
punjabkesari.in Monday, Jan 12, 2026 - 11:55 AM (IST)
Inspirational Context : आचार्य नागार्जुन को एक सहायक की आवश्यकता थी। कितने ही आयुर्वेद के जानकार युवकों ने अपनी सेवाएं उन्हें समर्पित करनी चाही पर आचार्य को केवल एक सहायक की आवश्यकता थी। आचार्य नागार्जुन ने ज्ञान परखने के लिए केवल दो युवकों को चुना।
आचार्य ने दोनों युवकों को अलग-अलग औषधि बनाकर लाने को कहा। औषधि बनाने के लिए एक दिन का समय दिया गया। दोनों युवक अपने-अपने घर गए। तीसरे दिन दोनों युवक आचार्य के सामने उपस्थित हुए। इनमें से एक युवक औषधि बनाकर ले आया था। दूसरा खाली हाथ ही चला आया था। उसने आचार्य से क्षमा मांगते हुए कहा, ‘‘मैं औषधि तैयार नहीं कर सका।’’
आचार्य ने कारण पूछा तो युवक बोला, ‘‘मैं जब जहां से लौटकर जा रहा था, तो मुझे मार्ग में एक रोगी मिल गया। दो दिन मैं उसका उपचार करने में लगा रहा। आज वह कुछ स्वस्थ हुआ है। मुझे दो दिन का समय और दे तो बड़ी कृपा होगी।’’

दूसरे युवक ने सोचा कि बाजी मार लेने का यह अच्छा अवसर है। वह बोला, ‘‘मेरी माता भी बीमार थी। फिर भी मैं आपकी आज्ञा के अनुसार औषधि बनाने में लगा रहा।’’ उसकी बात सुनकर आचार्य बोले, ‘‘अच्छा, तुम माता की बीमारी की उपेक्षा करके भी औषधि बनाने में लगे रहे।’’
फिर आचार्य नागार्जुन अपना निर्णय सुनाते हुए बोले, ‘‘तुम जाकर अपनी बीमार माता की सेवा करो। मैंने इस युवक को अपना सहारा चुन लिया है।’’
दूसरे युवक को लगा कि आचार्य का निर्णय न्याय संगत नहीं है। तब आचार्य ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘औषधि लोगों को रोग-मुक्त करने के लिए है। उसे बनाने वाला यदि रोगनाश के अपने कर्त्तव्य से विमुख होता है, तो यह अनुचित है। अत: मैंने दूसरे नौजवान को अपना सहायक नियुक्त किया है।’’
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