Guru Ravidas Jayanti 2026 : गुरु रविदास जयंती पर जानें उनके वो वचन जो आज भी अंधकार में दिखाते हैं रोशनी की राह
punjabkesari.in Sunday, Feb 01, 2026 - 02:54 PM (IST)
Guru Ravidas Jayanti 2026 : संत शिरोमणि गुरु रविदास जी की जयंती केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सत्य, प्रेम और समानता के मार्ग पर चलने का एक आह्वान है। मन चंगा तो कठौती में गंगा जैसा कालजयी सूत्र देने वाले गुरु रविदास जी ने समाज को वह दृष्टि दी, जहां भक्ति का अर्थ केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि अंतरात्मा की शुद्धि और परोपकार है। आज के इस दौर में, जहां मानसिक तनाव और आपसी मतभेद बढ़ते जा रहे हैं, गुरु रविदास जी के विचार अंधेरे में जलते हुए उस दीये के समान हैं जो हर समस्या का समाधान प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने सिखाया कि ईश्वर किसी खास मंदिर या मस्जिद में नहीं, बल्कि उन हाथों में बसते हैं जो ईमानदारी से अपना कर्म करते हैं। उनके जीवन दर्शन का सबसे सुंदर पहलू यह है कि उन्होंने जाति और धर्म की संकीर्ण दीवारों को गिराकर मानवता को ही सबसे ऊपर रखा। तो आइए जानते हैं गुरु रविदास जी के उन अनमोल वचनों के बारे में जो आज भी हमारे जीवन को नई दिशा और असीम शांति दे सकते हैं।

मन चंगा तो कठौती में गंगा
यह गुरु रविदास जी का सबसे प्रसिद्ध और प्रभावशाली विचार है। उनका मानना था कि यदि आपका मन शुद्ध है और आपके इरादे नेक हैं, तो आपको ईश्वर को खोजने के लिए कहीं तीर्थ यात्रा पर जाने की आवश्यकता नहीं है। यदि आपका हृदय पवित्र है, तो ईश्वर स्वयं आपके पास वास करते हैं।
मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है
गुरु रविदास जी ने जाति-पाति और ऊंच-नीच के भेदभाव को सिरे से नकारा। उन्होंने सिखाया कि इंसान अपनी जाति से नहीं, बल्कि अपने कर्मों से महान बनता है। उनका मानना था कि सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान हैं, इसलिए आपसी प्रेम ही सच्ची भक्ति है।

बेगमपुरा की परिकल्पना
रविदास जी ने एक ऐसे समाज का सपना देखा था जिसे उन्होंने बेगमपुरा कहा। यह एक ऐसा स्थान है जहां न कोई छोटा हो, न बड़ा, न कोई गरीब हो और न ही कोई भयभीत। उनके विचार हमें एक न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण समाज बनाने की प्रेरणा देते हैं।
कर्म ही पूजा है
वे स्वयं जूते बनाने का कार्य करते थे और उन्होंने कभी अपने श्रम को छोटा नहीं समझा। उनका संदेश था कि जो व्यक्ति ईमानदारी से अपना कार्य करता है, वही सच्चा भक्त है। अपनी जीविका को धर्म के साथ जोड़ना ही सफलता की कुंजी है।
अहंकार का त्याग
गुरु रविदास जी कहते थे कि जब तक इंसान के भीतर मैं का अहंकार रहता है, तब तक उसे परमात्मा नहीं मिल सकते। जैसे ही अहंकार समाप्त होता है, व्यक्ति को आत्मज्ञान की प्राप्ति हो जाती है।

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