Bharat Swastik Yatra: भारत स्वस्तिक यात्रा का प्रथम चरण संपन्न, केदारनाथ धाम में रचा गया नया आध्यात्मिक इतिहास
punjabkesari.in Saturday, Oct 24, 2026 - 12:40 PM (IST)
केदारनाथ, उत्तराखंड (परविंदर कुमार मिश्रा): भारत स्वस्तिक यात्रा ने भारत की पवित्र आध्यात्मिक विरासत से जुड़े स्थलों की अपनी यात्रा को आगे बढ़ाते हुए 23 अक्टूबर को केदारनाथ में पूज्य मोरारी बापू की रामकथा का आयोजन किया। गढ़वाल हिमालय में स्थित केदारनाथ सनातन धर्म में विशिष्ट स्थान रखता है। यह भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक और उत्तराखंड के चार धामों में शामिल प्रमुख तीर्थस्थल है। महाभारत, आदि शंकराचार्य और भारत की प्राचीन तीर्थयात्रा परंपराओं से इसका संबंध भारत स्वस्तिक यात्रा के इस पड़ाव को विशेष महत्त्व प्रदान करता है।
हिमालय में समुद्र तल से लगभग 3,580 मीटर की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ देश के सबसे पवित्र शिव तीर्थों में गिना जाता है। यह मंदिर उस पवित्र भूभाग में स्थित है, जिसे परंपरागत रूप से केदारखंड के नाम से जाना जाता है। इसके निकट ही मंदाकिनी नदी का उद्गम क्षेत्र है। मंदिर की भव्य पत्थर की संरचना, शिवलिंग का विशिष्ट प्राकृतिक स्वरूप और चारों ओर फैला विराट पर्वतीय परिदृश्य इसे भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के प्रमुख तीर्थों में स्थान देते हैं।
केदारनाथ का आदि शंकराचार्य से भी गहरा संबंध है। आदि शंकराचार्य दार्शनिक संत थे, जिन्होंने सनातन धर्म को सुदृढ़ करने तथा भारत में तीर्थयात्रा और मठ परंपराओं के पुनरुत्थान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। मान्यता है कि आदि शंकराचार्य ने केदारनाथ के निकट अपनी अंतिम मुक्ति प्राप्त की थी। मंदिर के पीछे स्थित आदि शंकराचार्य समाधि स्थल इसी परंपरा से जुड़ा है। उनका केदारनाथ से संबंध हिमालय की तीर्थ परंपरा को भारत की व्यापक आध्यात्मिक विरासत से जोड़ता है, जो उत्तर के पर्वतीय क्षेत्रों से लेकर दक्षिणी प्रायद्वीप तक विस्तृत है।
पूज्य मोरारी बापू ने कहा,“आदि शंकराचार्य का स्वस्तिक गंगोत्री, यमुनोत्री, बदरीनाथ और केदारनाथ के माध्यम से बना था। केदारनाथ इसका अंतिम पड़ाव था, जहां मान्यता है कि वे अंतर्धान होकर भौतिक जगत से विदा हो गए। रामेश्वरम, द्वारका, बदरीनाथ और केदारनाथ को चार धाम माना जाता है, लेकिन गंगोत्री, यमुनोत्री, बदरीनाथ और केदारनाथ के माध्यम से आदि शंकराचार्य की यात्रा भी हिमालय में एक प्राकृतिक स्वस्तिक का स्वरूप बन गई।
भारत स्वस्तिक यात्रा राष्ट्रीय एकता की दिशा में एक प्रयास है और भारत के माध्यम से पूरे विश्व तक एकता का संदेश पहुंचाने का उपक्रम है।
कथा के दौरान मैंने एक अज्ञात रचनाकार की साखी साझा की, जिनका उल्लेख मैंने अवधूत नाम से किया। उल्लेखनीय बात यह है कि यह साखी हमारे समय से बहुत पहले ही स्वस्तिक यात्रा की परिकल्पना करती प्रतीत होती है। इसमें दक्षिण से उत्तर की ओर यात्रा आरंभ होने, फिर पूर्व से और उसके बाद पश्चिम से पूर्व की ओर यात्रा का उल्लेख है। इसमें चार आवश्यक तत्त्वों की भी चर्चा है। भिक्षा, भजन, समाधि और संवेद। ये चारों तत्त्व मेरी अपनी आध्यात्मिक यात्रा और निम्बार्क परंपरा से गहराई से जुड़े हैं। ऐसा प्रतीत होता है, मानो किसी ने बहुत पहले ही यह कल्पना कर ली थी कि एक दिन इस प्रकार की यात्रा होगी।”
केदारनाथ के आसपास का आध्यात्मिक भूगोल अनेक महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थलों और परंपराओं को समेटे हुए है। गौरीकुंड को माता पार्वती की भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए की गई तपस्या से जोड़ा जाता है, जबकि भैरवनाथ को केदारनाथ का क्षेत्रपाल देवता माना जाता है। सर्दियों में भारी हिमपात के कारण जब मुख्य मंदिर तक पहुंचना संभव नहीं होता, तब उखीमठ स्थित ओंकारेश्वर मंदिर में पूजा-अर्चना जारी रहती है। इससे तीर्थ की धार्मिक परंपरा और अनुष्ठानों की निरंतरता बनी रहती है। ये सभी परंपराएं हिमालय के प्राकृतिक परिवेश और सनातन धर्म की आध्यात्मिक साधनाओं के बीच गहरे संबंध को दर्शाती हैं।
बारह ज्योतिर्लिंगों में केदारनाथ का स्थान इसे भारत के विभिन्न भागों में स्थित भगवान शिव के अन्य पवित्र तीर्थों से जोड़ता है। उत्तराखंड के चार धामों यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ में इसकी उपस्थिति देश की तीर्थयात्रा परंपरा में इसके महत्त्व को और स्थापित करती है। भगवान शिव, पांडवों और आदि शंकराचार्य से जुड़ी मान्यताओं के माध्यम से केदारनाथ शास्त्रीय परंपराओं, दार्शनिक चिंतन और भक्ति की जीवंत साधनाओं का संगम प्रस्तुत करता है। इन परंपराओं ने भारत की सभ्यतागत विरासत को आकार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
भारत स्वस्तिक यात्रा की परिकल्पना भारत की आध्यात्मिक विरासत और राष्ट्रीय पहचान को आपस में जोड़ने वाली एक व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि पर आधारित है। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारों पीठों और दार्शनिक संत से गहरा आध्यात्मिक संबंध रखने वाले ओंकारेश्वर को समाहित करने के साथ-साथ यह यात्रा भारत के राष्ट्रगान में उल्लिखित प्रत्येक राज्य और नदी को अपने मार्ग में शामिल कर रही है। इस प्रकार यात्रा साझा सांस्कृतिक आधार पर विभिन्न क्षेत्रों के इतिहास और पवित्र परंपराओं को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास करती है।
भारत स्वस्तिक यात्रा का आयोजन पूज्य मोरारी बापू के मार्गदर्शन में संतकृपा सनातन संस्थान द्वारा किया जा रहा है।
केदारनाथ में रामकथा के महत्त्व पर बोलते हुए मिराज समूह के चेयरमैन एवं संतकृपा सनातन संस्थान के मैनेजिंग ट्रस्टी मदन पालीवाल ने कहा, “केदारनाथ भारत की आध्यात्मिक विरासत की असाधारण निरंतरता का प्रतीक है। यहां भगवान शिव की परंपराएं, आदि शंकराचार्य की विरासत और हमारे प्राचीन शास्त्रों का ज्ञान आज भी जनजीवन से गहराई से जुड़े हुए हैं। भारत स्वस्तिक यात्रा के माध्यम से हमारा प्रयास इन पवित्र परंपराओं को प्रमुखता से सामने लाना और धर्म, सद्भाव तथा सर्वकल्याण के उन मूल्यों को रेखांकित करना है, जो हमारे देश को एक सूत्र में बांधते हैं।”
केदारनाथ में आयोजित रामकथा भारत स्वस्तिक यात्रा के प्रथम चरण का हिस्सा है। इस चरण की शुरुआत 10 अक्टूबर को कन्याकुमारी से हुई थी और 23 अक्टूबर 2026 को केदारनाथ में इसका समापन हुआ।
पूज्य मोरारी बापू की रामकथा सत्य, प्रेम और करुणा के मूल्यों पर आधारित है। उनके लिए भारत स्वस्तिक यात्रा इन मूल्यों को देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाने और साझा आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत के माध्यम से लोगों को जोड़ने का एक अवसर है।
यात्रा के दौरान आयोजित रामकथा और इससे जुड़े कार्यक्रम सभी के लिए खुले हैं। समावेशिता और सेवा की अपनी परंपरा के अनुरूप प्रत्येक पड़ाव पर भंडारे का आयोजन किया जाता है, जहां प्रतिदिन निःशुल्क शाकाहारी भोजन प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
