Bharat Swastik Yatra: ओंकारेश्वर में मोरारी बापू का दिव्य संदेश, 'ॐ' से ही स्वस्तिक का उद्गम, साधु बनने की जगह 'साधु के हो जाने' में है कल्याण
punjabkesari.in Friday, Oct 16, 2026 - 11:53 AM (IST)
ओंकारेश्वर (परविंदर कुमार मिश्रा): पवित्र ज्योतिर्लिंग क्षेत्र ओंकारेश्वर में मां नर्मदा के पावन तट पर 'भारत स्वस्तिक यात्रा' के आगमन के साथ ही संपूर्ण वातावरण हरि-नाम के गुंजायमान स्वर से सराबोर हो उठा। सनावद पहुंची इस यात्रा के दौरान आयोजित श्रीराम कथा में पूज्य मोरारी बापू ने व्यास पीठ से श्रद्धालुओं को भक्ति, विनम्रता, जीव-दया और सनातन मूल्यों का दुर्लभ ज्ञान बांटा। मंगलाचरण और हनुमान चालीसा के पाठ के साथ आरंभ हुई इस कथा में बापू ने ॐ और स्वस्तिक के गढ़े रहस्य से पर्दा उठाने के साथ-साथ समाज को एक नया आध्यात्मिक दृष्टिकोण प्रदान किया।
'ॐ' ही स्वस्तिक का मूल आधार: भारतीय परंपरा में '9' अंक की महिमा
कथा के दौरान मोरारी बापू ने स्पष्ट किया कि 'ॐ' समस्त मंत्रों का मूल है और इसी से 'स्वस्तिक' का प्राकट्य हुआ है। विश्व कल्याण की भावना से ऋषि-मुनियों द्वारा रचित ॐ की व्याख्या करते हुए उन्होंने शब्दकोश के हवाले से स्वस्तिक का एक अर्थ मीठा पदार्थ भी बताया। बापू ने स्वस्तिक के स्वरूप को समझाते हुए कहा कि जहां चार मार्ग आकर एक केंद्रीय बिंदु पर मिलते हैं, वहीं स्वस्तिक का आकार बनता है।
इसके साथ ही बापू ने भारतीय संस्कृति में 'नौ' (9) अंक के विशेष स्थान को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि नवरात्रि, नवग्रह, नवधा भक्ति, नौ निधियां, नौ नाथ, नौ तिथियां, नवरंग और नौ खंड जैसी विविध मान्यताएं यह सिद्ध करती हैं कि 9 का अंक हमारी भक्ति परंपरा की रीढ़ है।
ओंकारेश्वर में नाद-ब्रह्म का प्रकटीकरण: शंख से वंशी ध्वनि तक
ओंकारेश्वर धाम को नाद का सजीव प्रतीक बताते हुए बापू ने सृष्टि में व्याप्त विविध नादों का उल्लेख किया। उन्होंने शंख नाद, वेणु नाद, सिंह नाद, मेघनाद, डमरू नाद, समीर नाद, वरुण नाद, वंश नाद तथा गुरु द्वारा शिष्य के कान में दिए जाने वाले वनुष नाद की महत्ता समझाई।
कथा में विलंब होने पर बापू ने इसे ईश्वर की लीला बताया और एक रोचक प्रसंग साझा करते हुए कहा कि व्यास पीठ पर बैठते समय वे 'स्टेट बैंक' लगते हैं और उतरने के बाद 'रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया'। बापू ने शंकराचार्य जी के 'भज गोविंदम' प्रसंग का भी स्मरण कराया, जहां व्याकरण रटते वृद्ध ब्राह्मण को ज्ञान मार्ग से हटाकर गोविंद के भजन का संदेश दिया गया था।
"साधु मत बनो, साधु के हो जाओ": नाम खुमारी और विनम्रता का पाठ
जब लोगों ने बापू से कहा कि वे साधु नहीं बन सकते, तो बापू का सीधा जवाब था, "साधु मत बनो, बस साधु के हो जाओ।" उन्होंने स्पष्ट किया कि साधु कोई जाति या वेशभूषा नहीं, बल्कि विनम्रता, प्रेम और सद्गुणों से युक्त एक निर्मल स्वभाव का नाम है।
अभिमान के विभिन्न प्रकारों (स्वाभिमान, मिथ्या अभिमान, निराभिमान) की चर्चा करते हुए उन्होंने महाप्रभु जी के विचार रखे कि मनुष्य को हवा में पत्ते की तरह पूर्णतः विनम्र हो जाना चाहिए। सेठ और भिखारी के मार्मिक प्रसंग के जरिए बापू ने बताया कि धन या स्थिति की खुमारी तो क्षणिक है, लेकिन श्री गुरु नानक देव जी के संदेश अनुसार मनुष्य के मन में केवल 'हरि नाम की खुमारी' दिन-रात छाई रहनी चाहिए।
नवरात्रि में बलि प्रथा पर व्यास पीठ से छलका दर्द
नवरात्रि के पावन दिनों में आज भी कई स्थानों पर दी जाने वाली पशु-बलि पर मोरारी बापू ने गहरा दुख और पीड़ा व्यक्त की। उन्होंने व्यास पीठ से कड़ा आह्वान करते हुए कहा कि धार्मिक अनुष्ठानों के नाम पर हिंसा और बलि प्रथा पूरी तरह अनुचित है तथा इसे तुरंत बंद किया जाना चाहिए। धर्म का वास्तविक स्वरूप दया और अहिंसा में ही निहित है।
सुपुत्र, उपासना और सनातन धर्म की अजर-अमरता
बापू ने बताया कि एक योग्य सुपुत्र से पितृलोक और सच्ची उपासना से देवलोक धन्य हो जाता है। भगवान श्रीराम की महिमा का गान करते हुए उन्होंने कहा कि राम वे हैं जिनकी यात्रा केवल चरणों से नहीं, बल्कि नाम-प्रसाद और ईश्वर की असीम कृपा से आगे बढ़ती है।
सनातन धर्म पर विचार रखते हुए उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा को कोई मिटा नहीं सकता। भले ही समय-समय पर इसे क्षति पहुंचाने का प्रयास किया गया हो, लेकिन जब-जब धर्म पर संकट आता है, तब-तब उसका मार्गदर्शन करने स्वयं भगवान या उनके महान आचार्य धरा पर अवतरित होते हैं।
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Content Writer
Niyati Bhandari