ऋषि से शंकराचार्य तक का सफर ! कौन होता है साधु, संत और योगी ? समझें अंतर

punjabkesari.in Friday, Jan 23, 2026 - 05:50 PM (IST)

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Adi Shankaracharya : धार्मिक परंपराओं के अनुसार, भारत में मठ व्यवस्था की स्थापना आदि शंकराचार्य ने की थी। वे महान दार्शनिक और आध्यात्मिक गुरु थे, जिन्हें जगद्गुरु शंकराचार्य कहा जाता है। सनातन धर्म को संगठित और मजबूत करने के उद्देश्य से उन्होंने अपने चार प्रमुख शिष्यों को देश की चारों दिशाओं में मठों की जिम्मेदारी सौंपी। इन मठों के प्रमुख शंकराचार्य कहलाए और आज भी सनातन परंपरा में उनका विशेष स्थान है। वर्तमान में भारत में चार प्रमुख शंकराचार्य पीठ माने जाते हैं।

अक्सर लोग ऋषि, मुनि, योगी, साधु, संत और संन्यासी के बीच का अंतर समझ नहीं पाते। ये सभी आध्यात्मिक मार्ग से जुड़े हुए होते हैं, लेकिन इनका उद्देश्य और जीवनशैली अलग-अलग होती है।

Adi Shankaracharya

ऋषि वे महापुरुष होते हैं, जिन्होंने कठोर तपस्या और ध्यान के माध्यम से वेदों के मंत्रों और ब्रह्मांडीय सत्य का अनुभव किया होता है। इसी कारण उन्हें मंत्रद्रष्टा भी कहा जाता है। ऋषियों ने चिकित्सा, योग, दर्शन और विज्ञान जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। जैसे चरक ऋषि ने आयुर्वेद को विकसित किया, पतंजलि ने योगसूत्र की रचना की और कणाद ऋषि ने पदार्थों की सूक्ष्म संरचना का सिद्धांत दिया। ज्ञान और तपस्या के आधार पर ऋषियों को चार श्रेणियों में बांटा गया है।

राजर्षि वे राजा होते हैं जो शासन करते हुए भी उच्च आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, जैसे राजा जनक। महर्षि वे होते हैं जिन्होंने गहन तप और साधना से विशेष सिद्धियां प्राप्त की हों, जैसे वेदव्यास और विश्वामित्र। ब्रह्मर्षि सबसे उच्च स्तर के ऋषि माने जाते हैं, जिन्हें ब्रह्म का साक्षात्कार हुआ हो। देवर्षि वे होते हैं जो तीनों लोकों में विचरण करने की क्षमता रखते हैं, जैसे नारद।

Adi Shankaracharya

मुनि वे साधक होते हैं जो मौन, ध्यान और आत्मसंयम को अपना मार्ग बनाते हैं। वे कम बोलते हैं और अधिक समय साधना में बिताते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि मौन ही मुनि की सबसे बड़ी तपस्या है।

योगी वह व्यक्ति होता है जो योग अभ्यास के माध्यम से आत्मा और परमात्मा के बीच संबंध स्थापित करता है। उसका जीवन अनुशासन, संतुलन और साधना से भरा होता है। वह अपने मन, शरीर और प्राणशक्ति पर नियंत्रण रखता है। साधु वे होते हैं जो सांसारिक इच्छाओं का त्याग कर भक्ति, सेवा और धर्म के मार्ग पर चल पड़ते हैं। वे सरल जीवन जीते हैं और ईश्वर भक्ति में लीन रहते हैं।

संन्यासी वह होता है जिसने परिवार, संपत्ति और सामाजिक पद का त्याग कर दिया हो। वह भिक्षा पर जीवन यापन करता है और पूरी तरह तपस्या में समर्पित रहता है। संत वे होते हैं जिन्हें सत्य और ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव हो चुका होता है। वे अपने प्रेम, करुणा और भक्ति के माध्यम से समाज को सही मार्ग दिखाते हैं और लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाते हैं। इस प्रकार, भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में ये सभी मार्ग अलग-अलग होते हुए भी आत्मिक उन्नति की ओर ही ले जाते हैं।

Adi Shankaracharya
 


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Content Editor

Prachi Sharma

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