Makar Sankranti Death Significance: पितामह भीष्म ने प्राण त्यागने के लिए किया था मकर संक्रांति का इंतजार, क्या इस दिन मृत्यु से मिल जाता है मोक्ष?

punjabkesari.in Monday, Jan 12, 2026 - 10:55 AM (IST)

Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति का पर्व केवल एक पारंपरिक त्योहार नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक और शास्त्रीय महत्व से जुड़ा हुआ माना जाता है। हर साल 14 जनवरी को सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं और इसी के साथ सूर्य का उत्तरायण काल प्रारंभ होता है। शास्त्रों में इस काल को देवताओं का समय कहा गया है।

मकर संक्रांति के आसपास अक्सर लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु इस दिन या उत्तरायण काल में हो जाए, तो उसका क्या फल मिलता है? क्या वास्तव में मकर संक्रांति के दिन मृत्यु होने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है? इसका उत्तर महाभारत के पितामह भीष्म की कथा में मिलता है।

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मकर संक्रांति का आध्यात्मिक महत्व क्या है?
ज्योतिष और धर्म शास्त्रों के अनुसार, जब सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तब वे उत्तरायण हो जाते हैं। उत्तरायण को देवताओं का काल माना गया है, जबकि दक्षिणायन को पितरों से जोड़ा जाता है।

मान्यता है कि उत्तरायण में स्वर्ग के द्वार खुले रहते हैं। यह समय आत्मा की परमगति के लिए अनुकूल माना जाता है। इस काल में किया गया दान, तप और पुण्य कई गुना फल देता है। इसी कारण मकर संक्रांति को दान, स्नान और पुण्य कर्मों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

क्या मकर संक्रांति के दिन मृत्यु होने पर मिल जाता है मोक्ष?
शास्त्रों के जानकारों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु मकर संक्रांति के दिन या सूर्य के उत्तरायण काल में होती है, तो उसकी आत्मा के लिए स्वर्ग के द्वार खुले होते हैं। ऐसी आत्माओं को अत्यंत पुण्यात्मा माना गया है।

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धार्मिक मान्यता है कि

उत्तरायण में प्राण त्यागने से जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल सकती है। आत्मा को सीधे परमगति या मोक्ष की प्राप्ति होती है।
यह समय ईश्वर के अत्यंत निकट जाने वाला काल माना जाता है। हालांकि, विद्वान यह भी मानते हैं कि मोक्ष केवल तिथि से नहीं, बल्कि व्यक्ति के कर्म, भक्ति और जीवन के आचरण से तय होता है।

पितामह भीष्म ने मकर संक्रांति का ही क्यों किया था इंतजार?
इस मान्यता को समझने के लिए महाभारत के पितामह भीष्म की कथा सबसे बड़ा उदाहरण मानी जाती है। पितामह भीष्म को अपने पिता राजा शांतनु से इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था, यानी वे अपनी इच्छा से ही प्राण त्याग सकते थे।

महाभारत युद्ध के दसवें दिन अर्जुन के बाणों से उनका शरीर छलनी हो गया और वे रणभूमि में बाणों की शय्या पर गिर पड़े। असहनीय पीड़ा के बावजूद भीष्म ने उसी समय प्राण नहीं त्यागे, क्योंकि उस समय सूर्य देव दक्षिणायन में थे।

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बाणों की शय्या पर लेटकर भीष्म ने किया उत्तरायण का इंतजार
शास्त्रों में दक्षिणायन काल को प्राण त्यागने के लिए अनुकूल नहीं माना गया है। इस बात को पितामह भीष्म भली-भांति जानते थे। इसलिए उन्होंने महीनों तक बाणों की शय्या पर लेटकर सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार किया।

जब मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव उत्तरायण हुए, तब पितामह भीष्म ने शांत चित्त से अपने प्राण त्यागे। मान्यता है कि उसी क्षण उन्हें परमगति और मोक्ष की प्राप्ति हुई।

मकर संक्रांति और मृत्यु से जुड़ी मान्यताओं का निष्कर्ष
धार्मिक दृष्टि से मकर संक्रांति को जीवन और मृत्यु दोनों के संदर्भ में अत्यंत शुभ माना गया है। हालांकि, विद्वान यह भी कहते हैं कि केवल तिथि के आधार पर मोक्ष का निर्णय नहीं होता, बल्कि व्यक्ति का संपूर्ण जीवन, कर्म और भक्ति ही उसकी आत्मा की गति तय करते हैं।

फिर भी मकर संक्रांति और उत्तरायण काल को आध्यात्मिक उन्नति और परम शांति प्राप्ति के लिए सर्वोत्तम समय माना गया है।

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Content Writer

Niyati Bhandari

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