सतगुरु बावा लाल दयाल जी की 665वीं जयंती

2020-01-26T13:01:15.92

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आज श्री ध्यानपुर धाम सहित देश के सभी लालद्वारों में विशेष आयोजन होंगे
जालंधर (अश्विनी खुराना):
परम सिद्ध योगीराज सत्गुरु बावा लाल दयाल की 665वीं जयंती, जो 26 जनवरी को देश-विदेश में मनाई जा रही है, संबंधी आयोजन सभी लालद्वारों में शुरू हो गए हैं। मुख्य आयोजन श्री ध्यानपुर धाम में गद्दीनशीन महंत राम सुंदर दास जी की अध्यक्षता में हो रहा है, जिसके चलते पूरे क्षेत्र ने मेले-सा स्वरूप धारण कर लिया है। ध्यानपुर को जाते रास्तों पर संगत के लिए लंगर और स्वागती द्वार दिखाई दे रहे हैं। 26 को ध्यानपुर में ही विशेष सत्संग व आरती का आयोजन होगा। इसके लिए देश भर से श्रद्धालु पहुंच चुके हैं। 
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सत्गुरु बावा लाल दयाल का जीवन वृतांत 
सन 1355 ई. के माघ माह के शुक्ल पक्ष के द्वितीय तिथि को लाहौर स्थित ब्यास नदी पर बसे कस्बे कसूर में लाल नामक बालक का जन्म गांव के पटवारी भोलामल के यहां हुआ। नन्हे बालक ने धर्मपरायणता, संस्कारशीलता जैसे गुण अपनी माता कृष्णा देवी से प्राप्त किए। बचपन में ही इस बालक के मुखमंडल पर अलौकिक प्रभामंडल था, जिसे देख माता-पिता ने विद्वान ज्योतिषी को बुलवाया, जिसने भविष्यवाणी की कि यह लाल सामान्य बालक नहीं बल्कि अध्यात्म के मार्ग पर चल कर स्वयं तो मोक्ष प्राप्त करेगा ही, आने वाली पीढिय़ों का भी मार्गदर्शन कर उन्हें मुक्ति का मार्ग दिखाएगा। ज्योतिषी की भविष्यवाणी सच साबित हुई। यही बालक आगे चल कर परम सिद्ध, परम तपस्वी, ज्ञानी, योगीराज तथा परमहंस जैसी उपाधियों से अलंकृत हुआ। बावा लाल दयाल ने अपनी योग शक्ति द्वारा 300 वर्ष का सुदीर्घ जीवन प्राप्त किया। ऐसा माना जाता है कि हर 100 साल बाद आप योग शक्ति के बल पर बाल रूप धारण कर लेते थे। आपके तेज और विद्वता का ही प्रभाव था कि शहंशाह का पुत्र दारा शिकोह भी आपका शिष्य बना।
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बचपन में ही बावा लाल दयाल ने गुरमुखी, फारसी, संस्कृत इत्यादि भाषाओं के साथ वेद, उपनिषद और रामायण इत्यादि ग्रंथ कंठस्थ कर लिए। एक बार गऊएं चराते-चराते आपका मिलन महात्माओं की एक टोली से हुआ। इस टोली के प्रमुख महात्मा अपने पैरों का चूल्हा बनाकर उस पर चावल बना रहे थे। बालक लाल ने जब यह दृश्य देखा तो महात्माओं के चरण स्पर्श किए, जिन्होंने चावलों के तीन दाने प्रसाद रूप में बालक लाल को दिए। यह प्रसाद ग्रहण करते ही हृदय और मस्तिष्क में अपूर्व ज्योति प्रज्वलित हुई और मोह-माया के तमाम बंधन छूट गए। परमात्मा के मिलन की चाह लेकर बालक लाल सद्गुरु की तलाश में अनजान दिशा की ओर चल पड़ा।
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सतगुरु बावा लाल दयाल ने भारत के अनेक तीर्थ स्थलों का दर्शन करने के अलावा अफगानिस्तान और अन्य क्षेत्रों में भी भ्रमण किया। केदारनाथ धाम और हरिद्वार में लंबी तपस्या की। अंतिम चरण में आपने जिला गुरदासपुर के कलानौर कस्बे को अपना डेरा बनाया और नदी किनारे तपस्या करने लगे। यहीं आपने कायाकल्प कर16 वर्षीय बालक का रूप धारण किया। जहां एक बार इनका शिष्य ध्यानदास इन्हें एक टीले पर ले गया। यह स्थान बावा लाल दयाल जी को काफी अच्छा लगा और आपने इसे अपना डेरा बना लिया। ध्यानपुर धाम में ही सत्गुरु बावा लाल दयाल विक्रमी सम्वत 1712 में ब्रह्मलीन हुए। 
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महंत राम सुंदर दास ने बदला ध्यानपुर का स्वरूप
सत्गुरु बावा लाल दयाल की गद्दी के 15वें वर्तमान महंत श्री राम सुंदर दास जी एक नवम्बर 2001 को गद्दीनशीन हुए। इन 19 सालों में महंत राम सुंदर दास जी ने न केवल श्री ध्यानपुर धाम में अभूतपूर्व विकास करवाकर इस नगरी का स्वरूप ही बदल दिया, बल्कि हरिद्वार, वृंदावन और अन्य स्थानों पर भी सत्गुरु बावा लाल दयाल के सेवकों हेतु अभूतपूर्व सुविधाओं का इंतजाम किया। महंत राम सुंदर दास जी के नेतृत्व में श्री ध्यानपुर धाम में न केवल नए व विशाल सत्संग हाल का निर्माण हुआ है, बल्कि असंख्य नए कमरे बने हैं तथा पाॄकग का अच्छा इंतजाम कर दिया गया। विकास का यह सिलसिला आज भी जारी है।


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