35 साल में भारतीय शेयर बाजार का कायापलट, 1991 में सेंसेक्स में शमिल थी 30 कंपनियां, अब बची सिर्फ 7

punjabkesari.in Monday, Aug 03, 2026 - 01:34 PM (IST)

मुंबईः आर्थिक उदारीकरण के 35 साल बाद भारत के शेयर बाजार और कॉरपोरेट जगत की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। 1991 में बीएसई सेंसेक्स में शामिल 30 कंपनियों में से अब केवल 7 कंपनियां ही अपनी जगह बनाए रखने में सफल रही हैं। बाकी कंपनियां या तो कारोबार में पिछड़ गईं, बंद हो गईं या फिर देश की शीर्ष 30 सूचीबद्ध कंपनियों की दौड़ से बाहर हो गईं।

विश्लेषण के अनुसार, यह बदलाव भारतीय अर्थव्यवस्था के विनिर्माण-आधारित मॉडल से सेवा क्षेत्र और वित्तीय सेवाओं की ओर बढ़ते झुकाव को दर्शाता है। उदारीकरण के बाद आईटी, बैंकिंग और वित्तीय कंपनियों का तेजी से विस्तार हुआ, जबकि कई पारंपरिक औद्योगिक कंपनियां पीछे छूट गईं।

ये कंपनियां आज भी सेंसेक्स में कायम

1991 से अब तक सेंसेक्स में अपनी मौजूदगी बनाए रखने वाली कंपनियों में रिलायंस इंडस्ट्रीज, टाटा स्टील, हिंदुस्तान यूनिलीवर (HUL), आईटीसी, लार्सन एंड टुब्रो (L&T), महिंद्रा एंड महिंद्रा (M&M) और टाटा मोटर्स शामिल हैं। इन कंपनियों ने बदलते कारोबारी माहौल के साथ खुद को लगातार मजबूत किया।

कई दिग्गज कंपनियां हुईं बाहर

1991 में सेंसेक्स का हिस्सा रहीं कई प्रसिद्ध कंपनियां आज या तो बंद हो चुकी हैं या उनका बाजार मूल्य काफी घट गया है। इनमें बल्लारपुर इंडस्ट्रीज, प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स, हिंदुस्तान मोटर्स, फ्यूचुरा पॉलिएस्टर और जेनिथ स्टील जैसी कंपनियां शामिल हैं।

वहीं एसीसी, वोल्टास, इंडियन होटल्स, बॉम्बे डाइंग, सीएट, ग्रासिम, हिंडाल्को, नेस्ले इंडिया, सीमेंस और टाटा पावर जैसी कंपनियां अब भी बड़ी कंपनियों में गिनी जाती हैं, लेकिन सेंसेक्स का हिस्सा नहीं हैं।

सेवा क्षेत्र का बढ़ा दबदबा

1991 में सेंसेक्स की 30 में से 28 कंपनियां विनिर्माण और औद्योगिक क्षेत्र से जुड़ी थीं। उस समय सेवा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व केवल इंडियन होटल्स और ग्रेट ईस्टर्न शिपिंग जैसी दो कंपनियां करती थीं।

आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। सेंसेक्स में बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं और बीमा (BFSI) क्षेत्र का सबसे अधिक दबदबा है। इसके अलावा आईटी, दूरसंचार, रिटेल और इंटरनेट आधारित कंपनियों की हिस्सेदारी भी लगातार बढ़ी है।

पारिवारिक कंपनियों का असर घटा

उदारीकरण के दौर में पारिवारिक स्वामित्व वाली कंपनियों का दबदबा भी कम हुआ है। 1991 में सेंसेक्स की 30 में से 20 कंपनियां पारिवारिक समूहों के नियंत्रण में थीं। अब स्वतंत्र और संस्थागत स्वामित्व वाली कंपनियों की संख्या बढ़ी है, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र की कई कंपनियां भी सेंसेक्स का हिस्सा बनी हैं।

35 साल में सेंसेक्स ने दी शानदार बढ़त

मार्च 1991 में 1,168 अंकों पर मौजूद सेंसेक्स जुलाई 2026 के अंत तक बढ़कर 78,094.6 अंक पर पहुंच गया। इस दौरान सूचकांक में करीब 67 गुना की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसी अवधि में सेंसेक्स में शामिल कंपनियों का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन लगभग ₹20,194 करोड़ से बढ़कर ₹157.2 लाख करोड़ हो गया। यह वृद्धि भारतीय शेयर बाजार के विस्तार और अर्थव्यवस्था में आए बड़े बदलाव को दर्शाती है।

क्या है इसका मतलब?

विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले 35 वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था का फोकस पारंपरिक उद्योगों से हटकर बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं, आईटी और उपभोक्ता कारोबार की ओर बढ़ा है। सेंसेक्स में हुए बदलाव इसी आर्थिक परिवर्तन और निवेशकों की बदलती प्राथमिकताओं का स्पष्ट संकेत देते हैं।

 
 


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Content Writer

jyoti choudhary

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