राजनीति में अपराधियों की बढ़ती संख्या चिंताजनक

2021-07-28T05:36:52.97

आज संसद हल्ला-गुल्ला, शोर-शराबा, अव्यवस्था, बहिर्गमन, हाथापाई, माइक, कुर्सी टेबल तोडऩे का प्रतीक बन गई है। कुल मिलाकर यह तमाशा बन गई है। इसमें कौन-सी बड़ी बात है और संसद के मानसून सत्र के पहले सप्ताह में कुछ भी कार्य न हो पाने या तृणमूल के राज्यसभा सांसद द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री से कागज छीनकर फाडऩे पर अफसोस क्यों व्यक्त करें? उसके बाद तृणमूल सांसद और आवास मंत्री पुरी के बीच तीखी नोक-झोंक हुई, जिसके बाद मार्शल को तृणमूल सांसद को सदन से बाहर ले जाना पड़ा। 

किंतु यह कहानी यहीं समाप्त नहीं होती, पिछले मंगलवार को उच्चतम न्यायालय ने इस बात पर अफसोस व्यक्त किया कि राजनीति में दागी व्यक्ति अभी भी विद्यमान हैं हालांकि उसने पिछले वर्ष बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों को आदेश दिया था कि वे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को टिकट न दें। उ मीदवार की योग्यता, उपलब्धियों, गुणों, उसके विरुद्घ आपराधिक मामलों के बारे में जानकारी प्रकाशित कराएं। 

राजनीतिक दलों द्वारा बिहार विधानसभा के दौरान उ मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि की घोषणा न किए जाने के विरुद्घ एक अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा, ‘‘यहां विविधता में एकता है। हम विधायिका से कह रहे हैं कि वे एेसे उ मीदवारों के विरुद्ध कार्रवाई करें, जिनके विरुद्ध आरोप तय किए जा चुके हैं, किंतु किसी भी पार्टी द्वारा अपराधियों को राजनीति में प्रवेश करने या चुनाव में खड़े होने से रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया गया। 

दागी नेताओं या राजनीति को स्वच्छ करने में ऐसी कौन-सी बड़ी बात है कि हमारे नेता इससे बचते रहे और विशेषकर तब, जब वे सफेदी की चमकार वाली राजनीति की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और इस संबंध में अपने सच्चे प्रयासों को प्रमाणित करने के लिए किसी भी सीमा तक चले जाते हैं। किंतु जब उनके शब्दों को व्यवहार में लाने की बात आती है तो वे अनजान बन जाते हैं, आंखें बंद कर लेते हैं।

हैरानी की बात यह है कि पिछले वर्ष सितंबर की स्थिति के अनुसार 22 राज्यों में 2,556 सांसदों और विधायकों के विरुद्ध आपराधिक मामले थे। यदि इनमें पूर्व विधायकों को भी जोड़ दिया जाए तो इनकी सं या 4,442 है। वर्तमान में लोक सभा के 539 सदस्यों में से 233 अर्थात 43 प्रतिशत सदस्यों के विरुद्ध आपराधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से 30 प्रतिशत के विरुद्ध गंभीर मामले हैं, 10 सांसद सजाया ता हैं, 11 मामले हत्या, 20 मामले हत्या के प्रयास और 19 मामले महिलाआें के  अपहरण के हैं। इनमें से भाजपा के 301 सदस्यों में से 116 अर्थात 39 प्रतिशत, कांग्रेस के 51 में से 29 अर्थात 57 प्रतिशत, द्रमुक के 23 में से 10 अर्थात 43 प्रतिशत, तृणमूल के 22 में से 9 अर्थात 41 प्रतिशत, जद (यू) के 16 में से 13 अर्थात 81 प्रतिशत सदस्यों के विरुद्ध आपराधिक मामले हैं। 

एक कांग्रेसी सांसद ने अपने विरुद्घ 204 मामलों की घोषणा की है, जिनमें गैर-इरादन हत्या का प्रयास, जबरन किसी के घर में घुसना, डकैती, आपराधिक धमकी आदि मामले शामिल हैं। ऐसे सदस्यों की सं या 2004 में 24 प्रतिशत, 2009 में 30 प्रतिशत और 2014 में 34 प्रतिशत थी। राज्यों के बारे में कम ही कहा जाए तो अच्छा है। उत्तर प्रदेश में 401 विधायकों में से 143 अर्थात 36 प्रतिशत, बिहार  में  243 में से 142 अर्थात 58 प्रतिशत विधायकों के विरुद्ध आपराधिक मामले चल रहे हैं, जिनमें से 70 विधायकों अर्थात 49 प्रतिशत के विरुद्ध आरोप पत्र दायर किए जा चुके हैं। 

वस्तुत: उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक एेसे विधायक हैं जिनके विरुद्ध आपराधिक मामले लंबित हैं। राज्य में विधायकों के विरुद्ध 1217 मामले लंबित हैं। 446 मामले वर्तमान विधायकों के विरुद्ध हैं। भाजपा के 37 प्रतिशत विधायकों के विरुद्ध आपराधिक मामले लंबित हैं। 35 वर्तमान और 81 पूर्व विधायकों पर आजीवन कारावास की सजा से दंडनीय जघन्य मामले लंबित हैं। बिहार में 521 वर्तमान और पूर्व विधायकों के विरुद्ध आरोप पत्र दायर किए जा चुके हैं, जिनमें से 43 के विरुद्ध आजीवन कारावास की सजा जैसे दंडनीय मामले लंबित हैं। 

केरल में 333 मामले, ओडिशा में 331, महाराष्ट्र में 330 और तमिलनाडु में 324 मामले लंबित हैं। प्रश्न उठता है कि यदि ऐसे विधायक हों तो हम उनसे देश से अपराध उन्मूलन की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं। ऐसे वातावरण में जहां पर सत्ता का तात्पर्य सं या खेल बन गया है, राजनीतिक दल खुलेआम माफिया डॉन और अपराधियों को उम्मीदवार बनाते हैं क्योंकि वे अपने बाहुबल से मत प्राप्त कर लेते हैं और अवैध पैसे का चुनाव में प्रयोग कर विजयी बन जाते हैं, जबकि स्वच्छ छवि वाला उ मीदवार चुनाव हार जाता है। सांसद या विधायक का टैग उन्हें पुलिस मुठभेड़ और प्रतिद्वंद्वियों से बचाने का कार्य करता है।

त्रासदी यह है कि हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली को अपराधियों ने हड़प लिया है जिसके चलते हमारे देश में आज राजनीति में अच्छे लोगों की कमी है। समय आ गया है कि संसद लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में संशोधन पर विचार करे और एेसा कानून बनाए जिससे उस उ मीदवार को चुनाव लडऩे की अनुमति न मिले जिसके विरुद्ध गंभीर अपराधों में न्यायालय द्वारा आरोप निर्धारित किए जा चुके हैं। इसके साथ ही हमें मतदाताओं को भी जागरूक करना होगा तथा राजनीति के अपराधीकरण के लिए सही स्थितियां पैदा कर लोकतांत्रिक भागीदारी को बढ़ाना होगा अन्यथा हमें इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि आज के अपराधी किंगमेकर कल के किंग बन जाएंगे।-पूनम आई. कौशिश
 


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Content Writer

Pardeep

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