गर्भपात : अमरीका से बेहतर भारत के कानून

punjabkesari.in Friday, Jul 01, 2022 - 05:26 AM (IST)

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार प्रजनन और गर्भपात महिलाओं के अधिकारों का अभिन्न अंग है। इसे अंतर्राष्ट्रीय समझौतों के माध्यम से भी मान्यता मिली है। इसके बावजूद अमरीका में ट्रंप द्वारा नियुक्त जजों ने 50 साल पुराने महिलाओं के गर्भपात के संवैधानिक अधिकार को खत्म कर दिया। 

1973 में अमरीका की सुप्रीम कोर्ट ने रो बनाम वेड केस में ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि अमरीकी संविधान के तहत महिलाओं को गर्भपात का फैसला लेने का पूरा हक है। मिसिसिपी के नए मामले में 49 साल पुराने फैसले को बहुमत से पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट के जजों ने गर्भपात के संवैधानिक अधिकार को खत्म कर दिया। इस फैसले के बाद रिपब्लिकन पार्टी शासित राज्यों में रेप और इन्सैस्ट (पारिवारिक व्यभिचार) जैसे मामलों में अपवाद स्वरूप भी गर्भपात की अनुमति देने की गुंजाइश नहीं रखी जा रही है। अमरीका और कई अन्य देशों में चर्च और धार्मिक समूहों का मानना है कि भ्रूण को जीवन का हक है इसीलिए वे लोग गर्भपात को परम्पराओं और धार्मिक व्यवस्था के खिलाफ मानते हैं। 

पूरी दुनिया में इस फैसले को महिलाओं के जीवन, स्वतंत्रता और बराबरी के अधिकारों के हनन के तौर पर देखा जा रहा है। बंदूक लोगों की जान ले सकती है, फिर भी उसे कोई भी रख सकता है। उसके दुरुपयोग को खत्म करने की बजाय सबको जीवन देने वाली महिलाओं की जान को जोखिम में डालने की यह कोशिश खतरनाक है। आलोचकों के अनुसार अमरीका में बंदूकों के हक को मान्यता और गर्भपात के अधिकारों की समाप्ति कानून और संविधान का मजाक है। 

मिशेल ओबामा समेत हॉलीवुड की कई सैलीब्रिटीज ने अमरीकी कोर्ट के फैसले को गलत बताया है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त ने कहा है कि यह  फैसला महिलाओं के मानवाधिकारों और लैंगिक समानता के लिए एक बड़ा झटका है। इस फैसले के खिलाफ पूरे अमरीका में नाराजगी है और महिलाएं प्रदर्शन करने के साथ सोशल मीडिया के माध्यम से अपना गुस्सा निकाल रही हैं। अमरीका में गर्भ की स्थिति की जानकारी देने वाले  प्रैग्नैंसी सैंटरों में टैेस्ट रिजल्ट सहित कई निजी डाटा जुटाया जाता है। इस संवेदनशील अबार्शन डाटा की जानकारी लीक होने से महिलाओं की प्राइवेसी भी जोखिम में पड़ सकती है। 

डैमोक्रेट और रिपब्लिकन की सियासी जंग में महिलाएं मोहरा : अमरीकी राष्ट्रपति बाइडेन और उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने इस फैसले का विरोध करते हुए कहा है कि डैमोक्रेट पार्टी महिलाओं को राहत और संरक्षण प्रदान करने की हर मुमकिन कोशिश करेगी। लेकिन डैमोक्रेट शासित राज्यों में जाकर गर्भपात कराने के लिए महिलाओं को हजारों किलोमीटर का सफर करना पड़ सकता है, जो गरीब महिलाओं के लिए मुश्किल होगा। दूसरे तरीके के अनुसार गोलियों के इस्तेमाल से महिलाएं अनचाहे गर्भ से निजात पाने की कोशिश कर सकती हैं। लेकिन रिपब्लिकन पार्टी शासित जिन राज्यों में गर्भपात पर बैन लग रहा है वहां पर गर्भपात की गोलियों पर भी बैन लगाने की मांग उठ रही है। 

इन पाबंदियों की वजह से मजबूर महिलाएं अवैज्ञानिक तरीके से गर्भपात का प्रयास कर सकती हैं। ऐसे तरीके असुरक्षित होने के साथ महिलाओं की सेहत के लिए भी नुक्सानदायक  हो सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (ङ्ख॥ह्र) के अनुसार हर साल 2.5 करोड़ से अधिक असुरक्षित गर्भपात होने से 37 हजार महिलाओं की मौत हो जाती है। जब गर्भपात के लिए सुरक्षित और कानूनी पहुंच को प्रतिबाधित कर दिया जाता है तो महिलाएं विनाशकारी परिणामों के साथ कम सुरक्षित तरीकों का सहारा लेने के लिए मजबूर हो जाती हैं। इससे गरीब और वंचित वर्ग की महिलाएं सुरक्षित गर्भपात नहीं करवा पाने की वजह से इंफैक्शन, ब्लीडिंग या फिर अनचाही मौत का शिकार हो सकती हैं। 

भारत में गर्भपात के बारे में प्रगतिशील कानून: आई.पी.सी. कानून में गर्भपात और भ्रूण हत्या को अपराध ठहराया गया है, जिसकी वजह से एम.टी.पी. के विशेष कानून के तहत भारत में गर्भपात की इजाजत मिलने की प्रक्रिया है, लेकिन इस कानून का गलत इस्तेमाल कन्या भ्रूण हत्या के लिए नहीं हो सकता। भारत में 1960 के दशक में शांतिलाल शाह कमेटी की रिपोर्ट के बाद 1971 में मैडीकल टर्मीनेशन ऑफ प्रैग्नैंसी एक्ट (एम.टी.पी.) का क़ानून बना था। इसमें पिछले साल संशोधन के बाद गर्भपात करवाने के लिए मान्य अवधि को 20 हफ़्ते से बढ़ाकर 24 हफ्ते कर दिया गया है। नए कानून के तहत गर्भपात के लिए मान्य अवधि दुष्कर्म पीड़ित, सगे-संबंधियों के साथ यौन सम्पर्क की पीड़ित और अन्य असुरक्षित महिलाएं (विकलांग, नाबालिग) जैसे विशेष वर्ग की महिलाओं के लिए बढ़ाई गई है। 

भारत में सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों ने 2017 में प्राइवेसी के एक मामले में महिलाओं के गर्भधारण और गर्भपात के अधिकार को जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार से जोड़ा था। आजादी के बाद महिलाओं को समान मताधिकार और गर्भपात का कानूनी हक दिए जाने से ऐसा लगता है कि महिलाओं के जीवन, स्वतंत्रता और बराबरी के अधिकार दिए जाने के अनेक मोर्चों पर भारत अमरीका जैसे प्रगतिशील देश से बहुत आगे है। 

लैंसेट की 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार सन् 2015 में भारत में 1.56 करोड़ गर्भपात हुए। कानून के अनुसार सिर्फ एक्सपर्ट डाक्टरों के माध्यम से ही भारत में गर्भपात कराया जा सकता है, लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय की 2019-20 की रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण भारत में महिला डाक्टरों की 70 फीसदी कमी है। भारत में गैर कानूनी और अवैध तरीके से 8 लाख से ज्यादा सालाना गर्भपात होते हैं, जिनकी वजह से महिलाओं की स्वास्थ्य सुरक्षा को भारी खतरा है। प्रगतिशील कानूनी व्यवस्था के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को ठीक किया जाए तो भारत में महिलाओं का बेहतर कल्याण हो सकेगा।-विराग गुप्ता(एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट)
 


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