सत्ता गंवाने के बाद क्या अपना वजूद बचा पाएगी TMC? 28 सालों के इतिहास के सबसे गंभीर संकट जूझ रही है पार्टी

punjabkesari.in Friday, Jun 05, 2026 - 05:32 PM (IST)

नेशनल डेस्क: पश्चिम बंगाल में सत्ता गंवाने और विधानसभा में 58 विधायकों के विद्रोह के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) एक ऐसे प्रश्न का सामना कर रही है जो कुछ समय पहले तक असंभव माना जाता था क्या यह पार्टी अब अपने अस्तित्व को बचा पाएगी जिस पर लगभग तीन दशकों से ममता बनर्जी की मजबूत पकड़ रही है? करीब 28 वर्षों से तृणमूल की आंतरिक व्यवस्था एक ही सिद्धांत पर टिकी रही पार्टी और नेता ममता बनर्जी एक-दूसरे के पर्याय हैं। लेकिन अब पहली बार यह समीकरण गंभीर चुनौती के घेरे में है। पार्टी के भीतर शुरू हुआ असंतोष अब विधानसभा से आगे बढ़कर सांसदों तक पहुंचने की आशंका पैदा कर रहा है। साथ ही नेतृत्व, उत्तराधिकार और संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर भी गहरे मतभेद सामने आ रहे हैं। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि पार्टी के प्रतीक 'जोरा घास फूल' (फूल और घास) पर नियंत्रण को लेकर भी भविष्य में विवाद की संभावना जताई जा रही है।

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तृणमूल 1998 में अस्तित्व में आने के बाद से अपने 28 साल के इतिहास में सबसे बड़े संकट का सामना कर रही है। कांग्रेस से अलग हो कर ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। तृणमूल कांग्रेस के भीतर यह संकट केवल सत्ता से बाहर होने का नहीं बल्कि नेतृत्व की एकछत्र सत्ता पर उठे सवालों का है। हालांकि असंतुष्ट विधायक अब भी ममता बनर्जी के नेतृत्व को स्वीकार कर रहे हैं, लेकिन ममता के भतीजे और राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाने वाले अभिषेक बनर्जी के प्रति खुला विरोध सामने आया है। पार्टी के वरिष्ठ सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा कि जो लोग ममता बनर्जी का साथ छोड़ रहे हैं, उनका राजनीतिक अस्तित्व उनके बिना नहीं है। पार्टी के वरिष्ठ राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने आशंका जताई है कि असंतोष का यह माहौल आगे चलकर संसद तक फैल सकता है। हालांकि पार्टी नेतृत्व का दावा है कि अभी सांसदों के बीच किसी संगठित विद्रोह के संकेत नहीं हैं, लेकिन यह चिंता गहराती जा रही है कि विधानसभा का संकट लोकसभा और राज्यसभा तक जा सकता है। तृणमूल के पास वर्तमान में लोकसभा में 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं, और किसी भी तरह की टूट से विपक्षी राजनीति में उसका प्रभाव कमजोर हो सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह संकट महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) में हुए विभाजन से मिलता-जुलता दिखता है, जहां विधायक संख्या और संगठनात्मक नियंत्रण के आधार पर राजनीतिक दल टूट गए थे। हालांकि तृणमूल के मामले में ममता बनर्जी की सक्रिय राजनीतिक मौजूदगी और जनाधार इसे अलग बनाता है। फिर भी विश्लेषकों का कहना है कि महाराष्ट्र की घटनाएं चेतावनी के रूप में सामने हैं, जहां शुरुआत में नेताओं ने संगठन पर भरोसा जताया था, लेकिन अंततः उन्हें विधायकों और कानूनी लड़ाई के बीच संघर्ष करना पड़ा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि गुटबाजी बढ़ती है और मामला चुनाव आयोग तक पहुंचता है, तो पार्टी के प्रतीक 'घास-फूल' पर किसका अधिकार होगा। यह प्रतीक केवल एक चुनाव चिन्ह नहीं बल्कि बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी के आंदोलन की पहचान माना जाता है, जिसने वाम मोर्चे के 34 वर्षों के शासन का अंत किया था। तृणमूल के उदय में कांग्रेस, वाम दलों और भाजपा से आए नेताओं की बड़ी भूमिका रही है, लेकिन अब विपक्षी दलों का कहना है कि कभी तृणमूल को मजबूत करने वाला "दलबदल" का मॉडल अब उसी के लिए चुनौती बन गया है। इस संकट ने एक बार फिर उस संभावना को भी जन्म दिया है जिसे कुछ समय पहले तक असंभव माना जाता था—कांग्रेस के साथ संभावित राजनीतिक समझौता।

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विश्लेषकों का मानना है कि यदि उद्देश्य भाजपा विरोधी राजनीतिक मोर्चे को बचाना हुआ, तो टीएमसी और कांग्रेस के बीच नज़दीकी बढ़ सकती है। हालांकि पार्टी नेतृत्व अब भी आश्वस्त है कि ममता बनर्जी का जनाधार और राजनीतिक अनुभव उन्हें किसी भी संकट से उबार सकता है। इससे पहले भी 2004 में लोकसभा में केवल एक सीट तक सिमटने के बाद तृणमूल ने नंदीग्राम और सिंगूर आंदोलन के जरिए वापसी कर 2011 में सत्ता हासिल की थी। मौजूदा स्थिति पहले से अलग मानी जा रही है, क्योंकि यह संघर्ष विपक्ष में रहते हुए नहीं बल्कि 15 वर्षों की सत्ता के बाद आंतरिक थकान, उत्तराधिकार विवाद और नेतृत्व की चुनौती के बीच हो रहा है।

राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने यहां तक चेतावनी दी है कि पार्टी "टूटकर अस्तित्वहीन भी हो सकती है।" वहीं दूसरी ओर तृणमूल के वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय ने कहा "भाजपा टीएमसी में, लोकसभा और राज्यसभा में भी उसी तरह 'ऑपरेशन' करने की कोशिश कर सकती है, जैसा पश्चिम बंगाल विधानसभा में हुआ। लेकिन ममता बनर्जी ने इससे बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी हैं और वह वापसी करेंगी।" विश्लेषकों का कहना है कि तृणमूल के सामने अब केवल चुनावी जीत का नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक अस्तित्व और पहचान को बचाने का भी सवाल खड़ा हो गया है।


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News Editor

Radhika

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