Train की टाइमिंग कैसे होती है तय? जानिए प्लेटफॉर्म पर ट्रेनों के बीच कितना रखा जाता है गैप
punjabkesari.in Wednesday, Apr 08, 2026 - 05:51 PM (IST)
नेशनल डेस्क: भारतीय रेल से सफर करते समय अक्सर यात्रियों के मन में यह सवाल आता है कि आखिर ट्रेनों की टाइमिंग इतनी सटीक कैसे होती है। एक ही प्लेटफॉर्म पर अलग-अलग समय पर ट्रेनें कैसे आती-जाती हैं और उनके बीच कितना अंतर रखा जाता है? दरअसल, इसके पीछे एक मजबूत प्लानिंग, आधुनिक तकनीक और सुरक्षा से जुड़े कई नियम काम करते हैं।
कंट्रोल रूम और टाइम टेबल की अहम भूमिका
ट्रेन की टाइमिंग तय करने की जिम्मेदारी Indian Railways की होती है। इसके लिए रेलवे के कंट्रोल रूम और प्लानिंग विभाग लगातार पूरे नेटवर्क पर नजर रखते हैं। विशेषज्ञ पहले पूरे रूट का विश्लेषण करते हैं, जिसमें यह तय किया जाता है कि कितनी ट्रेनें चलेंगी, कौन सी ट्रेन कहां रुकेगी और किस समय स्टेशन से गुजरेगी। इसके बाद एक विस्तृत टाइम टेबल तैयार किया जाता है, जिसमें हर स्टेशन पर ट्रेन के पहुंचने और निकलने का समय पहले से तय होता है।
प्लेटफॉर्म और ट्रैक की क्षमता के अनुसार प्लानिंग
हर रेलवे ट्रैक और प्लेटफॉर्म की अपनी एक क्षमता होती है। किसी ट्रैक पर एक घंटे में कितनी ट्रेनें गुजर सकती हैं, यह पहले से तय होता है। अगर किसी रूट पर ट्रैफिक ज्यादा है, तो ट्रेनों के बीच ज्यादा अंतर रखा जाता है। वहीं, जहां ट्रैफिक कम होता है, वहां ट्रेनें कम अंतराल में चलाई जाती हैं। इसी आधार पर प्लेटफॉर्म पर ट्रेनों के आने-जाने का समय निर्धारित किया जाता है।
सिग्नलिंग सिस्टम से तय होता है अंतर
ट्रेनों के बीच कितना गैप होगा, यह काफी हद तक सिग्नलिंग सिस्टम पर निर्भर करता है। जिन रूट्स पर ऑटोमेटिक सिग्नलिंग सिस्टम होता है, वहां 5 से 10 मिनट के भीतर अगली ट्रेन आ सकती है। जबकि जिन जगहों पर मैन्युअल सिग्नलिंग होती है, वहां यह अंतर 15 से 30 मिनट तक हो सकता है। यह व्यवस्था सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाई जाती है, ताकि किसी भी तरह की दुर्घटना से बचा जा सके।
हर स्टेशन पर अलग होता है अंतराल
एक प्लेटफॉर्म पर ट्रेनों के बीच का अंतर तय नहीं होता, बल्कि यह स्टेशन की स्थिति पर निर्भर करता है। बड़े शहरों और व्यस्त स्टेशनों पर ट्रेनों की आवाजाही ज्यादा होती है, इसलिए वहां गैप कम रखा जाता है। वहीं छोटे स्टेशनों पर ट्रेनों के बीच अंतराल ज्यादा हो सकता है।
ट्रेन की स्पीड और स्टॉपेज का भी असर
ट्रेन की टाइमिंग उसके प्रकार पर भी निर्भर करती है। एक्सप्रेस ट्रेनें कम स्टॉपेज करती हैं, इसलिए उनका शेड्यूल अलग होता है और वे तेजी से चलती हैं। दूसरी ओर, पैसेंजर ट्रेनें लगभग हर स्टेशन पर रुकती हैं, जिससे उनका समय ज्यादा लगता है। अगर किसी वजह से कोई ट्रेन लेट हो जाती है, तो इसका असर अन्य ट्रेनों पर भी पड़ सकता है। ऐसे में कंट्रोल रूम तुरंत स्थिति का आकलन करता है और ट्रेनों का शेड्यूल दोबारा तय किया जाता है, ताकि व्यवस्था सुचारू बनी रहे।
