पुतिन के "गुरु" की भविष्यवाणीः अमेरिका की बादशाहत हो रही खत्म ! रूस-चीन के साथ भारत बन सकता गेम चेंजर
punjabkesari.in Thursday, May 21, 2026 - 04:37 PM (IST)
International Desk: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Vladimir Putin) के करीबी माने जाने वाले रूसी रणनीतिक विचारक अलेक्जेंडर डुगिन (Alexander Dugin) ने एक बार फिर वैश्विक राजनीति को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में अमेरिका की बादशाहत खत्म सकती है और रूस-चीन के साथ भारत गेम चेंजर बन सकता है। उन्होंने कहा कि एक समय पश्चिमी देश पूरी दुनिया के नियम तय करते थे, लेकिन अब रूस (Russia) और चीन (China) उस प्रभुत्व को चुनौती दे रहे हैं। डुगिन के मुताबिक अगर भारत (India) भी इस धुरी में सक्रिय रूप से शामिल होता है, तो दुनिया “चार ध्रुवों” वाली व्यवस्था की ओर बढ़ सकती है।
क्या है RIC थ्योरी?
RIC यानी रूस-भारत-चीन की अवधारणा नई नहीं है, लेकिन मौजूदा वैश्विक तनावों के बीच इसे फिर से चर्चा में लाया जा रहा है। समर्थकों का मानना है कि अगर ये तीन बड़े एशियाई देश रणनीतिक रूप से साथ आते हैं तो अमेरिकी प्रभाव को चुनौती दी जा सकती है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि भारत, रूस और चीन के हित पूरी तरह समान नहीं हैं। खासकर भारत और चीन के बीच सीमा विवाद, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक अविश्वास बड़ी बाधाएं हैं।
पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती क्यों?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से वैश्विक संस्थाओं और आर्थिक व्यवस्था पर पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका और यूरोपीय शक्तियों का प्रभाव रहा है। डॉलर की वैश्विक ताकत, NATO विस्तार, International Monetary Fund और World Bank जैसी संस्थाओं का प्रभाव, सैन्य और तकनीकी श्रेष्ठता ने दशकों तक अमेरिका को वैश्विक “नियम निर्माता” बनाए रखा। लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट और चीन के उभार ने इस व्यवस्था को चुनौती दी है।
रूस और चीन की नई रणनीति
रूस का कहना है कि NATO का विस्तार उसकी सुरक्षा के लिए खतरा है। वहीं शी जिनपिंग (Xi Jinping) के नेतृत्व में चीन आर्थिक और तकनीकी ताकत के दम पर अमेरिका को चुनौती दे रहा है। चीन Belt and Road Initiative, BRICS का विस्तार, वैकल्पिक वित्तीय संस्थाएं और AI, 5G और सेमीकंडक्टर में बढ़ती भूमिका के जरिए पश्चिमी व्यवस्था का विकल्प तैयार करने की कोशिश कर रहा है।
भारत की भूमिका सबसे अहम क्यों?
भारत की स्थिति सबसे दिलचस्प मानी जा रही है। भारत के अमेरिका के साथ भी मजबूत संबंध हैं और रूस के साथ भी पुराने रणनीतिक रिश्ते कायम हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की विदेश नीति को “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति माना जाता है। भारत क्वाड (QUAD) का हिस्सा होते हुए भी उसे औपचारिक सैन्य गठबंधन नहीं मानता। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत पूरी तरह किसी ब्लॉक में शामिल होने के बजाय खुद को एक स्वतंत्र शक्ति केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहता है।
क्या अमेरिका सचमुच कमजोर पड़ रहा है?
कई विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका की “अजेय महाशक्ति” वाली छवि को हाल के संघर्षों और वैश्विक तनावों से झटका लगा है। लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि पश्चिम का प्रभाव खत्म हो गया है। आज भी अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है और डॉलर वैश्विक वित्त व्यवस्था का केंद्र है। तकनीक, विश्वविद्यालय और मीडिया में पश्चिम का दबदबा कायम है। हालांकि इतना जरूर है कि अब दुनिया पूरी तरह “एकध्रुवीय” नहीं रही।
भारत के सामने चुनौती
विशेषज्ञों के मुताबिक अगर भारत को चौथे वैश्विक ध्रुव के रूप में उभरना है, तो उसे सैन्य क्षमता मजबूत करनी होगी, उत्पादन और विनिर्माण बढ़ाना होगा, ऊर्जा निर्भरता कम करनी होगी तथा तकनीकी क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना होगा। भारत फिलहाल संतुलन की नीति अपनाकर अमेरिका, रूस और वैश्विक दक्षिण तीनों के साथ संबंध बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। दुनिया तेजी से बदल रही है। अमेरिका का प्रभाव चुनौती झेल रहा है, चीन नई महाशक्ति के रूप में उभर चुका है और रूस पश्चिमी व्यवस्था को खुली चुनौती दे रहा है। लेकिन भारत अभी किसी “RIC गुट” में पूरी तरह शामिल होने के बजाय अपनी अलग पहचान और स्वतंत्र शक्ति केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।
