लाल सागर जंग में भी क्या भारत सेफ: तेल सप्लाई पर कितना पड़ेगा असर ? रूस पर टिका अब सारा खेल
punjabkesari.in Monday, Jul 27, 2026 - 02:41 PM (IST)
International Desk: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब सिर्फ होर्मुज जलडमरूमध्य तक सीमित नहीं रहा। लाल सागर (रेड सी) में भी हालात लगातार बिगड़ रहे हैं। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने एक बार फिर सऊदी अरब के तेल ठिकानों और समुद्री मार्गों को निशाना बनाया है। इससे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक और ऊर्जा मार्गों में अस्थिरता बढ़ गई है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल भारत की रूस से होने वाली कच्चे तेल की आपूर्ति पर इसका बड़ा असर पड़ने की संभावना कम है।
रूस से जुड़े जहाजों को राहत क्यों ?
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85% आयात करता है। रूस से आने वाला तेल समुद्री मार्गों के जरिए भारत पहुंचता है और कई जहाज लाल सागर व स्वेज नहर के रास्ते गुजरते हैं। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी सैन्य तनाव का असर वैश्विक तेल बाजार और शिपिंग लागत पर पड़ सकता है 2024 में इजरायल-हमास युद्ध के दौरान हूती विद्रोहियों ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि रूस और चीन से जुड़े जहाजों को निशाना नहीं बनाया जाएगा। उनका मुख्य लक्ष्य अमेरिका, ब्रिटेन और इजरायल से जुड़े जहाज थे।
चूंकि ईरान और रूस के बीच रणनीतिक संबंध मजबूत हैं, इसलिए माना जा रहा है कि रूस से भारत आने वाले अधिकांश तेल टैंकर फिलहाल अपेक्षाकृत सुरक्षित रह सकते हैं। हालांकि पूरी तरह राहत की स्थिति नहीं है। रूस अपने कई तेल टैंकर तथाकथित 'शैडो फ्लीट' के जरिए संचालित करता है। इन जहाजों की वास्तविक मालिकाना संरचना, बीमा और संचालन कई देशों के माध्यम से होता है। यदि किसी जहाज की पहचान स्पष्ट नहीं होती, तो वह हमलों का जोखिम झेल सकता है।
भारत ने रूस से बढ़ाई तेल खरीद
पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के बीच भारत ने रूस से कच्चे तेल का आयात और बढ़ा दिया है। उपलब्ध व्यापारिक आंकड़ों के अनुसार, मार्च से मई के बीच भारत ने रूस से लगभग 17.13 अरब डॉलर का कच्चा तेल खरीदा, जो पिछले वर्ष की तुलना में करीब 30% अधिक है। इसी अवधि में भारत ने बड़ी मात्रा में रुपये में भी भुगतान किया, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक सहयोग और मजबूत हुआ। विशेषज्ञों का कहना है कि 2024 की तुलना में मौजूदा हालात अलग हैं। उस समय हूती विद्रोहियों का मुख्य निशाना इजरायल और उसके सहयोगी देश थे, जबकि अब उनका फोकस सऊदी अरब और उसके ऊर्जा ढांचे पर अधिक दिखाई दे रहा है।
वहीं, अमेरिका के साथ जारी संघर्ष के कारण ईरान भी अपने संसाधनों पर दबाव महसूस कर रहा है, जिससे हूतियों को मिलने वाला प्रत्यक्ष समर्थन पहले की तुलना में सीमित माना जा रहा है। फिलहाल भारत के लिए तत्काल आपूर्ति संकट की संभावना कम है, लेकिन यदि लाल सागर में संघर्ष लंबा खिंचता है या समुद्री मार्गों पर हमले बढ़ते हैं, तो शिपिंग लागत, बीमा प्रीमियम और वैश्विक तेल कीमतों में बढ़ोतरी का असर भारत पर भी पड़ सकता है। इसलिए भारत लगातार वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों और ऊर्जा सुरक्षा पर नजर बनाए हुए है।
