पंजाब की शादियों में दुल्हन को चूड़ा क्यों पहनाया जाता? जानें इसका क्या है इतिहास
punjabkesari.in Wednesday, Feb 25, 2026 - 09:20 AM (IST)
नेशनल डेस्क: पंजाबी शादियों की चमक-धमक और शोर-शराबे के बीच एक रस्म ऐसी है, जो दुल्हन के दिल के सबसे करीब होती है—वह है 'लाल चूड़ा'। सफेद और लाल रंग की इन चूड़ियों का शोर हर पंजाबी दुल्हन की पहचान है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आधुनिकता के इस दौर में भी यह परंपरा इतनी खास क्यों है? दरअसल, चूड़ा सिर्फ एक गहना नहीं, बल्कि भावनाओं, सुरक्षा और सांस्कृतिक बदलाव का एक गहरा प्रतीक है, जिसका इतिहास सदियों पुराना है।
मामा का प्यार और सुरक्षा का कवच
पारंपरिक रूप से चूड़ा पहनने की रस्म का सीधा संबंध दुल्हन के ननिहाल से है। इसे दुल्हन के मामा और मौसी उपहार स्वरूप देते हैं। यह इस बात का संकेत है कि भले ही बेटी अपना घर छोड़कर जा रही है, लेकिन अपने मायके का प्यार, आशीर्वाद और सुरक्षा का कवच वह हमेशा अपनी कलाइयों में समेटे रहेगी।

रंगों का गहरा अर्थ और सकारात्मकता
चूड़े में लाल और हाथी दांत (सफेद) रंगों का ही चयन क्यों किया जाता है, इसके पीछे भी एक ठोस वजह है।
लाल रंग: यह प्रेम, अटूट शक्ति और वैवाहिक जीवन के उल्लास को दर्शाता है।
सफेद रंग: यह पवित्रता और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।
सामूहिक रूप से ये रंग नई दुल्हन के जीवन में खुशहाली, फर्टिलिटी और अच्छी किस्मत लेकर आते हैं। साथ ही, यह माना जाता है कि चूड़ा नवविवाहित जोड़े को बुरी नजर और नकारात्मक ऊर्जा से बचाए रखता है।
समाज में 'नई पहचान' का संकेत
पुराने समय में चूड़ा पहनने के पीछे एक व्यावहारिक कारण भी था। यह समाज के लिए एक सार्वजनिक संकेत होता था कि महिला की हाल ही में शादी हुई है। इसकी वजह से नई दुल्हन को घर के भारी कामकाज से छूट दी जाती थी और समाज उसे एक विशेष सम्मान की दृष्टि से देखता था। यह पति-पत्नी के बीच के शुरुआती बंधन को मजबूत करने का एक जरिया भी माना जाता था।

चूड़ा चढ़ाने की पवित्र रस्म
शादी की सुबह होने वाली यह रस्म बेहद भावुक होती है। चूड़ियों को पहले दूध और गुलाब की पंखुड़ियों से शुद्ध किया जाता है। इसके बाद मामा रस्मी तौर पर इसे दुल्हन को पहनाते हैं। एक दिलचस्प रिवाज यह भी है कि पहनने के बाद दुल्हन तब तक अपने चूड़े को नहीं देखती, जब तक वह पूरी तरह तैयार न हो जाए। इसीलिए अक्सर चूड़े को सफेद कपड़े से ढक दिया जाता है।

समय के साथ बदलता स्वरूप
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पहले दुल्हनें पूरे एक साल तक चूड़ा पहनती थीं। हालांकि, बदलते वक्त के साथ अब यह अवधि घटकर 40 से 45 दिन रह गई है। चूड़ा उतारने की प्रक्रिया भी किसी रस्म से कम नहीं होती। एक छोटी पूजा के बाद इसे सम्मानपूर्वक उतारा जाता है और पारंपरिक रूप से बहते पानी में विसर्जित कर दिया जाता है।
आज चूड़ा सिर्फ पंजाब तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्लोबल फैशन बन चुका है, लेकिन इसकी जड़ों में आज भी वही पुराना इतिहास और मायके की ममता बसी हुई है।
