पंजाब केसरी की खबर पर मुहर, एनडीए से अलग हुआ शिरोमणि अकाली दल

2020-09-27T04:56:45.583

नेशनल डेस्कः किसानों का विरोध झेल रही मोदी सरकार को पंजाब में बहुत बड़ा झटका लगा है। बिहार चुनाव से पहले एनडीए के सबसे पुराने साथी शिरोमणि अकाली दल ने मोदी सरकार से गठबंधन तोड़ लिया है।पंजाब केसरी की खबर पर मुहर लगी है, जिसने सबसे पहले बताया था कि शिरोमणि अकाली दल (SAD) एनडीए से अलग हो सकता है। पार्टी की कोर समिति की बैठक के बाद उन्होंने यह घोषणा की। इससे पहले हरसिमरत कौर बादल केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा दे चुकी हैं।

सुखबीर ने कहा, ‘‘शिरोमणि अकाली दल की निर्णय लेने वाली सर्वोच्च इकाई कोर समिति की आज रात हुई आपात बैठक में भाजपा नीत राजग से अगल होने का फैसला सर्वसम्मति से लिया गया।'' इससे पहले राजग के दो अन्य प्रमुख सहयोगी दल शिवसेना और तेलगु देशम पार्टी भी अन्य मुद्दों पर गठबंधन से अलग हो चुके हैं। लोकसभा में शिरोमणि अकाली दल के हरसिमरत कौर और सुखबीर सिंह बादल दो सांसद हैं, वहीं राज्यसभा में तीन सदस्य हैं।

गौरतलब है कि हाल ही में संसद में पास हुए कृषि बिल को लेकर मोदी सरकार को किसानों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। कृषि बिल को लेकर पंजाब, हरियाणा और पश्चमी उत्तर प्रदेश के किसान सड़कों पर हैं।बता दें कि कृषि बिल के विरोध में हरसिमरत कौर ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद अटकलें लगाई जा रही थीं कि अकाली दल एनडीए से रिश्ता तोड़ सकता है। शुक्रवार को किसानों ने भारत बंद का ऐलान किया था, किसानों के इस विरोध प्रदर्शन को विपक्ष का भी समर्थन मिल रहा है। कांग्रेस मोदी सरकार पर हमलावर है। कांग्रेस मोदी सरकार द्वारा पारित कराए गए कृषि बिलों को काला कानून बता रही है।

शिरोमणि अकाली दल के एनडीए से अलग होने पर भाजपा को बिहार विधानसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ सकता है। दरअसल, बिहार में कुछ सीटों पर सिख समुदाय का प्रभाव बहुत है, जिनमें पटना साहिब की संसदीय सीट अहम मानी जा रही है क्योंकि पटना साहिब संसदीय क्षेत्र में आने वाली विधानसभा सीटों पर इसका असर पड़ सकता है। 

किसान व सिख समाज शिरोमणि अकाली दल का पक्का वोट बैंक माना जाता रहा है। पंजाब के 90 फीसदी किसान जट्ट सिख हैं, लिहाजा किसानी मुद्दों का सीधा संबंध सिख समाज से भी है। इस बात को भांपते ही शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सुखबीर सिंह बादल ने अपनी धर्मपत्नी से इस्तीफा दिला कर यह संदेश दिया है कि शिरोमणि अकाली दल किसानों के लिए कोई भी कुर्बानी दे सकता है। अकाली दल को अपने अस्तित्व को बचाने के लिए यह इस्तीफा देना ही पडऩा था क्योंकि वर्ष 2017 के विधान सभा चुनाव में अकाली दल मात्र 17 सीटों पर सिमट कर रह गया था जबकि 2019 के लोक सभा चुनाव में सिर्फ बादल दंपति ही चुनाव जीतने में सफल हो सका था।

अकाली दल के डूबते राजनीतिक सूर्य को भांपते हुए ही रणजीत सिंह ब्रह्मपुरा, सेवा सिंह सेखवां, सुखदेव सिंह ढींडसा जैसे टकसाली अकाली नेता बादल परिवार को छोड़ गए थे। कैप्टन सरकार के 4 वर्ष होने को हैं परंतु अभी तक पंजाब की राजनीति में अकाली दल के उखड़े पैर नहीं जम रहे थे। इसको भांपते हुए ही अकाली दल को इस्तीफे का यह कड़वा घूंट पीना पड़ा। अकाली दल के इस फैसले का सब से ज्यादा नुक्सान आम आदमी पार्टी ‘आप’ को होने की संभावना है क्योंकि कैप्टन सरकार व अकाली-भाजपा से नाराज किसान ‘आप’ की तरफ जाने लगे थे। समय को संभालते हुए अकाली दल ने इस्तीफा देकर ऐसा राजनीतिक वार किया है कि इससे कैप्टन अमरेन्द्र सिंह व आप को करारा झटका लगा है। अब सुखबीर सिंह बादल, हरसिमरत कौर बादल व अन्य अकाली नेता किसानों के हक में डट सकेंगे।


Yaspal

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