2.5 लाख रुपये दाम, नींद नहीं आती: कर्नाटक की मैसूर सिल्क साड़ियों के लिए सुबह 4 बजे से कतार में खड़ी महिलाएं
punjabkesari.in Thursday, Jan 22, 2026 - 09:14 AM (IST)
नेशनल डेस्क: कर्नाटक में शुद्ध मैसूर सिल्क साड़ियों की मांग इन दिनों चरम पर है। स्थिति यह है कि महिलाएं सुबह 4 बजे से ही कर्नाटक सिल्क इंडस्ट्रीज़ कॉरपोरेशन (KSIC) के शोरूम के बाहर कतार में लग रही हैं। साड़ियों की कीमत 23 हजार रुपये से शुरू होकर ढाई लाख रुपये तक जा रही है। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए एक ग्राहक को सिर्फ एक ही साड़ी दी जा रही है और खरीदारी के लिए टोकन सिस्टम लागू किया गया है।
2025 से जारी है शुद्ध मैसूर सिल्क की कमी
पूरे वर्ष 2025 में शुद्ध और असली मैसूर सिल्क साड़ियों की लगातार कमी देखी गई है और यह समस्या 2026 तक भी बनी रहने की आशंका है। खास तौर पर KSIC द्वारा बनाई जाने वाली साड़ियों की मांग आपूर्ति से कहीं ज्यादा है। कर्नाटक सिल्क इंडस्ट्रीज़ कॉरपोरेशन ही एकमात्र सरकारी संस्था है, जिसके पास GI टैग प्राप्त असली मैसूर सिल्क बनाने का अधिकार है। इसी वजह से लोग केवल सरकारी शोरूम से ही साड़ी खरीदना चाहते हैं।
Women queue up from 4.00 AM outside a Karnataka Soviet (sorry Silk) Industries Corporation showroom to buy silk sarees starting from ₹23,000 and going up to ₹250,000. Only 1 saree per customer and you need a token to be in the queue.
— Rakesh Krishnan Simha (@ByRakeshSimha) January 20, 2026
There is an ongoing shortage (or more… pic.twitter.com/d100w3hql0
उत्पादन बढ़ाना क्यों है मुश्किल?
साड़ियों की कमी के पीछे कई कारण हैं:
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KSIC के पास सीमित संख्या में प्रशिक्षित बुनकर और कारीगर हैं
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एक नए कारीगर को साड़ी बुनाई में बुनियादी दक्षता पाने में भी 6 से 7 महीने का समय लगता है
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उत्पादन केवल सरकारी कारीगरों और सरकारी इकाइयों तक सीमित है, जिससे तेजी से उत्पादन बढ़ाना संभव नहीं
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शादी-ब्याह और त्योहारों के मौसम में मांग अचानक बहुत बढ़ जाती है
त्योहारों में और बढ़ जाती है परेशानी
शादी का सीजन, वरलक्ष्मी व्रत, गौरी-गणेश उत्सव और दीपावली जैसे मौकों पर साड़ियों की मांग कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे समय में शोरूम में स्टॉक जल्दी खत्म हो जाता है और ग्राहकों को लंबा इंतजार करना पड़ता है।
सोवियत दौर जैसी स्थिति, लेकिन भरोसे की गारंटी
विशेषज्ञ इस स्थिति की तुलना सोवियत यूनियन के दौर से कर रहे हैं, जहां ज्यादातर चीजों की भारी कमी रहती थी। हालांकि KSIC के मामले में एक बड़ा फर्क यह है कि यहां मिलने वाली साड़ियां 100% असली और प्रमाणित होती हैं। इसके उलट, निजी कंपनियों पर अक्सर नकली या चीनी कृत्रिम सिल्क बेचने के आरोप लगते रहे हैं।
तिरुपति की घटना से बढ़ा भरोसे का संकट
हाल ही में तिरुपति में सामने आए एक मामले में यह खुलासा हुआ कि एक निजी ठेकेदार भक्तों को नकली सिल्क वस्त्र सप्लाई कर रहा था। इस घटना के बाद लोगों का भरोसा निजी कंपनियों से और कमजोर हो गया है और वे सरकारी सिल्क पर ही भरोसा कर रहे हैं। असली मैसूर सिल्क की शुद्धता और भरोसे की वजह से मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन सीमित उत्पादन के कारण साड़ियों की उपलब्धता कम बनी हुई है। जब तक कारीगरों की संख्या और उत्पादन क्षमता नहीं बढ़ती, तब तक यह कमी बनी रह सकती है।
