'UGC बिल वापस लें या इच्छामृत्यु की अनुमति दें', अयोध्या के जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने PM को लिखा पत्र

punjabkesari.in Tuesday, Jan 27, 2026 - 11:16 PM (IST)

नेशनल डेस्कः विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए नए नियमों को लेकर देशभर में विवाद गहराता जा रहा है। खासतौर पर उत्तर प्रदेश में इन नियमों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। अब इस मुद्दे पर अयोध्या के जगद्गुरु परमहंस आचार्य भी खुलकर सामने आ गए हैं। जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने पत्र में मांग की है कि या तो UGC के नए नियम तुरंत वापस लिए जाएं, या फिर उन्हें इच्छामृत्यु (मरने की अनुमति) दी जाए।

जगद्गुरु परमहंस का बयान: नियम नहीं हटे तो इच्छामृत्यु

जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री को साफ शब्दों में पत्र लिखा है। उनका कहना है कि UGC के नए नियम समाज में विभाजन और अन्याय को बढ़ावा देंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर केंद्र सरकार इन नियमों को वापस नहीं लेती, तो वे इच्छामृत्यु की अनुमति मांगेंगे।

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला, नियमों को दी गई कानूनी चुनौती

इस बीच, UGC के नए नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर कर दी गई है। यह याचिका वरिष्ठ अधिवक्ता विनीत जिंदल की ओर से दाखिल की गई है।

याचिका में कहा गया है कि:

  • नए नियम जनरल कैटेगरी (सामान्य वर्ग) के साथ भेदभाव करते हैं

  • यह संविधान के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है

  • खासतौर पर रेगुलेशन 3(सी) पर रोक लगाने की मांग की गई है

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी मांग की है कि 2026 के नियमों के तहत बनने वाली व्यवस्था सभी जातियों पर समान रूप से लागू हो, न कि किसी एक वर्ग को निशाना बनाया जाए।

यूपी के कई जिलों में सड़कों पर उतरे लोग

UGC के नए नियमों के खिलाफ उत्तर प्रदेश के कई जिलों में विरोध प्रदर्शन जारी हैं। मंगलवार को अलीगढ़, संभल, कुशीनगर समेत कई जिलों में छात्र संगठनों और सामाजिक समूहों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान UGC का पुतला जलाया गया, प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ नारे लगाए गए और आरोप लगाया गया कि नए नियम उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव को बढ़ाएंगे। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने मांगें नहीं मानीं, तो आंदोलन और उग्र होगा।

आरोप: सवर्ण छात्रों को पहले ही दोषी मान लिया गया

नियमों का विरोध कर रहे संगठनों का कहना है कि नए नियमों में सवर्ण छात्रों को पहले से ही दोषी मान लिया गया है। इससे सवर्ण छात्रों और शिक्षकों का उत्पीड़न होगा, झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ कोई सजा तय नहीं की गई है और इससे फर्जी मामलों की बाढ़ आ सकती है। विरोधियों का यह भी कहना है कि भेदभाव की परिभाषा एकतरफा है और कमेटियों में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व को लेकर स्थिति साफ नहीं है।

बीजेपी के खिलाफ नाराजगी, सांसदों को भेजी गईं चूड़ियां

UGC के नए नियमों को लेकर बीजेपी के खिलाफ भी गुस्सा बढ़ता जा रहा है। रायबरेली में बीजेपी किसान नेता रमेश बहादुर सिंह और गौरक्षा दल अध्यक्ष महेंद्र पांडेय ने सवर्ण बीजेपी सांसदों को चूड़ियां भेजीं, यह आरोप लगाते हुए कि वे चुप हैं। बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने नियमों के विरोध में इस्तीफा दे दिया। बीजेपी के करीबी माने जाने वाले कवि कुमार विश्वास ने भी सरकार पर तंज कसा।

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की सफाई

विरोध बढ़ने के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान सामने आए और सफाई दी।

उन्होंने कहा कोई भी इस कानून का दुरुपयोग नहीं कर सकेगा। किसी के साथ अत्याचार या भेदभाव नहीं होगा। UGC, केंद्र और राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि नियमों का सही पालन हो। धर्मेंद्र प्रधान ने भरोसा दिलाया कि: “यह पूरी व्यवस्था भारत के संविधान के दायरे में रहेगी और किसी को परेशान नहीं किया जाएगा।”

चंद्रशेखर आजाद बोले– यह नियम जरूरी हैं

इस मुद्दे पर भीम आर्मी प्रमुख और आजाद समाज पार्टी नेता चंद्रशेखर आजाद ने बिल्कुल अलग रुख अपनाया।

उन्होंने कहा, जिन्हें लगता था कि कमजोर वर्गों से भेदभाव करना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है, उन्हें ही दिक्कत हो रही है। आज भी SC, ST और OBC वर्ग सबसे ज्यादा शोषण झेल रहे हैं। टैक्स सब देते हैं, लेकिन समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जाता।

चंद्रशेखर आजाद ने दावा किया कि UGC की नई गाइडलाइन में विरोध करने जैसा कुछ नहीं है इसमें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को भी शामिल किया गया है। यह नियम सामाजिक न्याय को मजबूत करने के लिए जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि,“जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, वे सामाजिक न्याय के खिलाफ खड़े हैं।”

शिक्षा से राजनीति तक पहुंचेगा विवाद

UGC के नए नियम अब सिर्फ एक शैक्षणिक मामला नहीं रह गए हैं। यह विवाद धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप ले चुका है। आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट का रुख अहम होगा। केंद्र सरकार की अगली प्रतिक्रिया निर्णायक होगी और यह मुद्दा 2027 के यूपी चुनाव में भी बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है।


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Content Writer

Pardeep

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