कलंक हट गया है, भगवान ले भी जाए तो... 20 रुपए के रिश्वत केस में 30 साल जेल काटी, बरी हुए और अगले ही दिन मौत
punjabkesari.in Sunday, Feb 08, 2026 - 12:16 AM (IST)
नेशनल डेस्कः गुजरात में एक बेहद दुखद और हैरान करने वाला मामला सामने आया है। एक व्यक्ति को मात्र 20 रुपये रिश्वत लेने के आरोप में 30 साल तक जेल और कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। जब आखिरकार हाई कोर्ट ने उसे निर्दोष घोषित किया, तो खुशी ज्यादा देर टिक नहीं पाई और अगले ही दिन उसकी मौत हो गई। इस कहानी की तुलना हॉलीवुड फिल्म Shawshank Redemption से की जा रही है, लेकिन यहां अंत बेहद दर्दनाक रहा।
4 फरवरी को गुजरात हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पुलिस कांस्टेबल बाबूभाई प्रजापति पूरी तरह निर्दोष थे. फैसले के बाद उन्होंने भावुक होकर कहा था, “मेरी जिंदगी से कलंक मिट गया, अब अगर भगवान मुझे ले भी जाएं तो मुझे कोई दुख नहीं होगा।” लेकिन दुख की बात यह है कि यह राहत उन्हें बहुत कम समय के लिए मिली।
मामला कैसे शुरू हुआ? (1996 से 2026 तक का सफर)
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1996: अहमदाबाद में तैनात पुलिस कांस्टेबल बाबूभाई प्रजापति पर आरोप लगा कि उन्होंने किसी व्यक्ति से 20 रुपये रिश्वत ली।
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1997: उनके खिलाफ सेशन कोर्ट में चार्जशीट दाखिल हुई।
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2002: उनके खिलाफ औपचारिक आरोप तय किए गए।
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2003: मामले में गवाहों की सुनवाई शुरू हुई।
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2004: सेशन कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराते हुए 4 साल की जेल और 3,000 रुपये जुर्माना सुनाया।
इसके बाद बाबूभाई ने इस फैसले को गुजरात हाई कोर्ट में चुनौती दी। लेकिन उनकी अपील 22 साल तक लंबित रही। आखिरकार 4 फरवरी 2026 को हाई कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास थे। अभियोजन पक्ष आरोप साबित नहीं कर पाया इसलिए बाबूभाई प्रजापति को पूरी तरह निर्दोष घोषित किया गया।
उनके वकील नितिन गांधी ने कोर्ट में कहा था कि पूरा मामला सिर्फ शक के आधार पर बनाया गया था, ठोस सबूत नहीं थे।
बरी होने के बाद क्या हुआ?
फैसले के बाद बाबूभाई बहुत खुश थे। वे अपने वकील के ऑफिस गए और वहीं उन्होंने भावुक बयान दिया कि अब उनकी जिंदगी का दाग मिट गया है। वकील ने उन्हें सलाह दी थी कि वे सरकार से मिलने वाले मुआवजे और कानूनी लाभ के लिए आवेदन करें। लेकिन अगले ही दिन वकील ने जब उन्हें फोन किया, तो परिवार ने बताया कि दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई। उनके शुभचिंतकों ने कहा, “काश वे यह खुशी कुछ दिन और जी पाते।”
क्यों है यह मामला अहम?
यह मामला दिखाता है कि न्याय मिलने में अत्यधिक देरी हो सकती है। झूठे आरोप किसी की पूरी जिंदगी बर्बाद कर सकते हैं। अदालत में सालों की देरी से पीड़ित को बहुत देर से राहत मिलती है।
