सुप्रीम कोर्ट ने 30 हफ्ते के गर्भ को गिराने की दी मंजूरी, महिला को बिना मर्जी मां बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता
punjabkesari.in Friday, Feb 06, 2026 - 01:53 PM (IST)
नेशनल डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी महिला की मर्जी के बिना उसे मां बनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने एक नाबालिग लड़की की पीड़ा को समझते हुए उसे 30 हफ्ते के गर्भ को गिराने की इजाजत दे दी है। जस्टिस बी. वी. नागरथना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि महिला के अपने शरीर और जीवन पर फैसले लेने का अधिकार सर्वोपरि है।
'जबरन मां नहीं बनाया जा सकता'
इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अदालत ने कहा कि जब लड़की खुद मानसिक या शारीरिक रूप से उस बच्चे को जन्म देने के लिए तैयार नहीं है, तो उसे गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर करना उसके अधिकारों का हनन होगा। कोर्ट ने मुंबई के जेजे अस्पताल को पूरी सुरक्षा और मेडिकल देखरेख में यह प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया है। अदालत ने इस बात को दरकिनार कर दिया कि गर्भ ठहरने की वजह क्या थी; कोर्ट के लिए सबसे बड़ी सच्चाई यह थी कि पीड़िता नाबालिग है और वह इस बोझ को आगे नहीं ढोना चाहती।
कानून और जज्बात के बीच का फैसला
सुनवाई के दौरान जजों ने स्वीकार किया कि यह उनके लिए भी एक कठिन घड़ी थी। एक तरफ वह अजन्मा बच्चा था जो दुनिया में आ सकता था, और दूसरी तरफ एक छोटी बच्ची का भविष्य था। जस्टिस नागरथना ने कहा कि कानून में वैसे तो 24 हफ्ते तक ही गर्भपात की सामान्य अनुमति है, लेकिन सिर्फ वक्त ज्यादा बीत जाने के आधार पर किसी को मजबूर नहीं किया जा सकता। अगर लड़की साफ तौर पर कह रही है कि वह मां नहीं बनना चाहती, तो 30 हफ्ते की मियाद को बाधा नहीं बनाया जाना चाहिए।
महिला के अधिकार सबसे ऊपर
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला समाज और कानून के लिए एक नजीर की तरह है। अदालत ने साफ संदेश दिया है कि मां के हितों और उसकी पसंद को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस फैसले ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि न्यायपालिका व्यक्ति की गरिमा और उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सबसे ऊपर रखती है।
