गुरुग्राम में 'सपनों के घर' के नाम पर बड़ा खेल: ₹2 करोड़ देकर मिला श्मशान का नजारा, M3M के प्रोजेक्ट पर गहराया विवाद
punjabkesari.in Wednesday, Feb 18, 2026 - 04:30 PM (IST)
नेशनल डेस्क: गुरुग्राम की चमक-धमक वाली ऊंची इमारतों में अपना आशियाना तलाश रहे सैकड़ों लोगों के साथ एक ऐसी धोखाधड़ी सामने आई है, जिसने रियल एस्टेट सेक्टर के भरोसे को हिलाकर रख दिया है। करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद खरीदारों को पता चला है कि जिस आलीशान बालकनी से उन्हें 'ग्रीन व्यू' का वादा किया गया था, वहां से अब उन्हें श्मशान घाट दिखाई देता है। यह मामला अब देश की सबसे बड़ी उपभोक्ता अदालत (NCDRC) तक पहुंच चुका है, जिसने बिल्डर की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए हैं।
करोड़ों का निवेश और 'श्मशान' की ओर खुलती बालकनी
मामला गुरुग्राम के सेक्टर 61 स्थित एम3एम (M3M) के 'स्मार्ट वर्ल्ड ऑर्चर्ड' प्रोजेक्ट का है। लगभग 800 खरीदारों ने अपनी मेहनत की कमाई से फ्लैट खरीद जिनकी कीमत करीब ₹1.1 करोड़ से लेकर ₹2.4 करोड़ तक थी—लोगों को उम्मीद थी कि उन्हें एक प्रीमियम गेटेड कम्युनिटी मिलेगी। लेकिन 90 फीसदी भुगतान करने के बाद जब खरीदारों ने साइट का दौरा किया, तो उनके होश उड़ गए। ब्रोशर में दिखाए गए आलीशान 'एंट्री गेट' और 'ग्रीन एरिया' की जगह उन्हें सार्वजनिक सड़कों से कटा हुआ प्रोजेक्ट मिला, जिसकी बालकनी का मुंह सीधे श्मशान घाट की ओर है।
वादों का जाल और 'विभाजित' जमीन का सच
खरीदारों का आरोप है कि उन्हें एक 'इंटीग्रेटेड गेटेड कम्युनिटी' का सपना दिखाकर निवेश कराया गया था, लेकिन बिल्डर ने बाद में चतुराई से जमीन को 'ग्रीन' और 'एवेन्यू' जैसे अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया। सबसे बड़ी समस्या सड़कों की है; मुख्य मार्ग से जिस प्रवेश द्वार का वादा किया गया था, वह कुछ खरीदारों के लिए गायब है। कुछ ब्लॉकों को जोड़ने के लिए एक कनेक्टिंग ब्रिज बनाया गया था, जिसे ग्रामीणों ने अवैध बताकर ध्वस्त कर दिया। अब बिल्डर खरीदारों को गांव के कच्चे और अविकसित रास्तों से घर पहुंचने का विकल्प दे रहा है, जिससे उनकी प्रॉपर्टी की वैल्यू काफी कम हो गई है।
निर्माण अधूरा, फिर भी खरीदारों पर EMI का बोझ
बिल्डर की चालाकी यहीं खत्म नहीं हुई। खरीदारों को लुभाने के लिए 'सबवेंशन स्कीम' दी गई थी, जिसमें कब्जा मिलने तक EMI का भुगतान बिल्डर को करना था। लेकिन जुलाई 2024 में बिल्डर ने अचानक यह भुगतान बंद कर दिया और दावा किया कि उसे 'ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट' मिल गया है। जबकि खरीदारों का कहना है कि मौके पर केवल 10% काम ही पूरा हुआ है और यूनिट्स रहने लायक नहीं हैं। अब मध्यम वर्ग के ये खरीदार घर के किराए, अदालती खर्च और भारी-भरकम बैंक EMI के दोहरे बोझ के नीचे पिस रहे हैं।
कंज्यूमर कोर्ट का हस्तक्षेप और बिल्डर को नोटिस
महीनों तक बिल्डर के दफ्तर के चक्कर काटने के बाद, थक-हारकर खरीदारों ने 'नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रेड्रेसल कमीशन' (NCDRC) का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए 13 फरवरी को बिल्डर को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही, अदालत ने खरीदारों के खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई पर फिलहाल रोक लगा दी है। अब देखना यह है कि क्या इन 800 परिवारों को वह घर और सुविधाएं मिल पाएंगी जिसका वादा उन्हें करोड़ों रुपये लेकर किया गया था।
