दुनिया में ''खाद्य संकट'': होर्मुज विवाद के कारण खाद्य आपूर्ति ठप, भारत समेत कई देशों में हाहाकार
punjabkesari.in Monday, Mar 23, 2026 - 01:07 AM (IST)
नेशनल डेस्क : जब दुनिया का ध्यान मध्य पूर्व में डिमोना पर हुए मिसाइल हमलों और होर्मुज जलडमरूमध्य की ओर बढ़ रहे जंगी जहाजों पर टिका है, तो पर्दे के पीछे एक गंभीर संकट खड़ा हो गया है, जिसका सीधा असर आपकी रसोई और आपकी खाने की थाली पर पड़ेगा। दुनिया में नाइट्रोजन उर्वरक की सप्लाई 21 मील चौड़े होर्मुज जलडमरूमध्य में बुरी तरह फंसी हुई है, जिससे वैश्विक कृषि और खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा पैदा हो गया है।
उर्वरक की कीमतें आसमान छू रही हैं
समुद्र के रास्ते भेजे जाने वाले दुनिया के एक-तिहाई नाइट्रोजन उर्वरक की खेप इस समय फारस की खाड़ी में फंसी हुई है। दस लाख मीट्रिक टन उर्वरक ले जाने वाले 21 जहाज वहां फंसे हुए हैं। इसका असर यह हुआ है कि न्यू ऑरलियन्स (अमेरिका) में यूरिया की कीमत सिर्फ एक हफ्ते में 516 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 683 डॉलर प्रति टन हो गई है।
भारत और पड़ोसी देश गंभीर स्थिति में
इस संकट ने एशियाई देशों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। भारत के उर्वरक संयंत्र इस समय अपनी क्षमता के सिर्फ 60 प्रतिशत पर ही चल रहे हैं। भारत सरकार ने चीन से आपातकालीन यूरिया की मांग की थी, लेकिन चीन ने साफ इनकार कर दिया, क्योंकि उसने अपने किसानों की सुरक्षा के लिए नाइट्रोजन-पोटैशियम और फॉस्फेट के निर्यात पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। बांग्लादेश ने अपने छह में से पांच यूरिया संयंत्र बंद कर दिए हैं, जिससे 17 करोड़ लोगों का पेट भरने वाली धान की फसल पर खतरा मंडरा रहा है। पाकिस्तान में उत्पादन पूरी तरह ठप हो गया है, जबकि श्रीलंका अपनी उर्वरक की 70 प्रतिशत ज़रूरत खाड़ी देशों से आयात करता है, जहां से अब आयात पूरी तरह बंद हो गया है।
खाने को नज़रअंदाज़ किया गया
युद्ध शुरू होने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाला पहला जहाज एक पाकिस्तानी तेल टैंकर था, न कि कोई उर्वरक जहाज। इससे पता चलता है कि अर्थव्यवस्था को चलाने वाले ईंधन (तेल) को, लोगों का पेट भरने वाले उर्वरक की तुलना में ज़्यादा प्राथमिकता दी जा रही है। जबकि खाड़ी देश दुनिया के कुल यूरिया निर्यात का 49 प्रतिशत और अमोनिया का 30 प्रतिशत हिस्सा सप्लाई करते हैं।
कृषि मौसम पर खतरा
भारत में खरीफ का मौसम मई में शुरू होने वाला है, और अमेरिका में मक्का बोने का मौसम तीन हफ़्तों में शुरू हो रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर आज कोई जहाज खाड़ी से निकलता है, तो भी उसे खेतों तक पहुंचने में दो महीने लगेंगे। नाइट्रोजन की मात्रा में 20 प्रतिशत की कमी से दुनिया की फसल पैदावार में स्थायी रूप से 5 से 10 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।
सूत्रों ने चेतावनी दी है कि भले ही 15 अप्रैल को युद्धविराम हो जाए, लेकिन 16 अप्रैल को मिट्टी तक नाइट्रोजन नहीं पहुँच पाएगी; क्योंकि खेती का कैलेंडर न तो राष्ट्रपतियों से कोई समझौता करता है और न ही जनरलों से। समय पर खाद न मिलने के कारण जो फसल बर्बाद हो जाएगी, वह फिर कभी वापस नहीं आएगी।
