पढ़े-लिखे प्रोफेशनल भी होते हैं फाइनेंशियल साइबर क्राइम का शिकार, IIT मद्रास की स्टडी में खुलासा
punjabkesari.in Tuesday, Sep 29, 2026 - 01:51 PM (IST)
चेन्नई : IIT मद्रास के रिसर्चर्स की एक स्टडी में पाया गया है कि देश में फाइनेंशियल साइबर क्राइम के शिकार अक्सर बहुत पढ़े-लिखे प्रोफेशनल होते हैं। इससे उस सोच को चुनौती मिलती है कि शिकार मुख्य रूप से लापरवाह, आर्थिक रूप से अनजान या लालची लोग होते हैं। स्टडी में पाया गया कि ज्यादा डिजिटल जानकारी होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति साइबर फ्रॉड से सुरक्षित रहेगा। संस्थान की ओर से मंगलवार को जारी एक बयान में कहा गया कि पीड़ितों में IT प्रोफेशनल, बैंकर, डॉक्टर, मैनेजमेंट और फाइनेंस प्रोफेशनल, सरकारी अधिकारी और साइबर सिक्योरिटी सर्टिफिकेशन वाले लोग शामिल थे।
भारत में तेजी से हो रहे डिजिटल बदलाव, लगभग हर किसी के पास मोबाइल की सुविधा, UPI और 'डिजिटल इंडिया' अभियान के कारण एक दशक के भीतर करोड़ों नए यूजर डिजिटल फाइनेंस से जुड़े हैं। इससे इन्वेस्टमेंट और स्टॉक-ट्रेडिंग फ्रॉड, टास्क और जॉब स्कैम, डिजिटल पेमेंट फ्रॉड, मैलवेयर अटैक और खास तौर पर भारत में होने वाले "डिजिटल अरेस्ट" स्कैम के लिए बड़े पैमाने पर हमले का खतरा पैदा हो गया है। हालांकि इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) के आधिकारिक आंकड़े ट्रांजैक्शन में हुई गड़बड़ी को तो दर्ज करते हैं, लेकिन वे इन आंकड़ों के पीछे छिपे मानवीय दुख-दर्द पर चुप रहते हैं। इसी वजह से रिसर्च टीम ने तकनीकी सवाल के बजाय मानवीय पहलू पर सवाल उठाने का फैसला किया।
रिसर्चर्स ने पाया कि पीड़ितों को अक्सर तनाव या जिंदगी में उथल-पुथल के समय निशाना बनाया जाता था, जैसे परिवार में बीमारी, रिटायरमेंट, नौकरी की तलाश या काम का दबाव। धोखाधड़ी करने वालों ने डर, आर्थिक उम्मीदों और प्रतिष्ठा की चिंता का फायदा उठाकर एक तरह की 'सोचने-समझने की क्षमता का अचानक रुक जाना' (इंजीनियर्ड ब्रेन फ्रीज) जैसी स्थिति पैदा कर दी। पीड़ितों ने इसे "दिमाग का लॉक हो जाना" (माइंड अरेस्ट) बताया, जिससे उनकी साफ-साफ सोचने की क्षमता प्रभावित हुई।
आर्थिक नुकसान कुछ हजार रुपए से लेकर करोड़ों तक जा सकता था, जबकि पीड़ितों ने शर्म, नींद न आना, डिप्रेशन और परिवार का भरोसा टूटने जैसी समस्याओं का भी जिक्र किया। स्टडी में यह भी पाया गया कि अलग-अलग संस्थानों का रवैया अलग-अलग था; कुछ बैंकों और साइबर क्राइम सेल ने तेजी से कार्रवाई की, जबकि अन्य में जरूरी तकनीकी क्षमता और तालमेल की कमी थी। ये नतीजे चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, नई दिल्ली और मुंबई में 33 पीड़ितों (22 पुरुष और 11 महिलाएं, जिनमें 12 सीनियर सिटिज़न शामिल थे) के साथ किए गए सेमी-स्ट्रक्चर्ड इंटरव्यू पर आधारित हैं। ये इंटरव्यू अंग्रेजी, हिंदी और तमिल में किए गए और इनका विश्लेषण 'जियोइया मेथोडोलॉजी' (Gioia methodology) का इस्तेमाल करके किया गया।
इस स्टडी का नेतृत्व IIT मद्रास के प्रो. पी. कंडास्वामी (रिटायर्ड IPS) और प्रो. नंदन सुदर्शनम ने किया। इसमें यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया (चेन्नई कैंपस) की एसोसिएट प्रोफेसर प्रो. आकांक्षा जायसवाल और चेन्नई के लोयोला इंस्टीट्यूट ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की प्रो. अमिता फर्नांडो का भी सहयोग मिला। इस रिसर्च को IIT मद्रास के वाधवानी स्कूल ऑफ डेटा साइंस एंड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से मदद मिली।
नतीजों के बारे में बताते हुए IIT मद्रास के वाधवानी स्कूल ऑफ डेटा साइंस एंड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नंदन सुदर्शनम ने कहा, 'हमारे नतीजों से पता चलता है कि फाइनेंशियल साइबर क्राइम सिर्फ डिजिटल जानकारी की कमी की समस्या नहीं है। बहुत पढ़े-लिखे और डिजिटल रूप से अनुभवी लोग भी तब शिकार बन सकते हैं जब धोखेबाज डर, तनाव और जल्दबाजी का फायदा उठाते हैं। रोकथाम की बेहतर रणनीतियां बनाने के लिए इन बातों को समझना जरूरी है।'
IIT मद्रास के डेटा साइंस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विभाग और मैनेजमेंट स्टडीज विभाग में एडजंक्ट फैकल्टी, प्रो. पी. कंडास्वामी (रिटायर्ड IPS) ने कहा, 'साइबर क्राइम पर प्रतिक्रिया सिर्फ पीड़ितों को दोष देने से आगे बढ़नी चाहिए। बैंकों और कानून लागू करने वाली एजेंसियों को जल्दी पता लगाने, तेजी से कार्रवाई करने और मिलकर प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूत सिस्टम की जरूरत है, साथ ही पीड़ितों को बेहतर मदद भी मिलनी चाहिए।'
