न किताबें, न क्लासरूम… IRS अफसर ने बगीचे में शुरू कर दी ‘पेड़ों की पाठशाला’, जानिए क्या है इसकी खासियत
punjabkesari.in Saturday, Feb 07, 2026 - 07:15 PM (IST)
नेशनल डेस्क : जब IRS ऑफिसर रोहित मेहरा पेड़ों की बात करते हैं, तो उनकी आवाज़ में किसी विशेषज्ञ का घमंड नहीं, बल्कि एक जिज्ञासु सीखने वाले की सादगी होती है। वे बच्चों को पढ़ाने नहीं, उनके साथ सीखने के लिए बुलाते हैं। यही सोच उनके सोसाइटी गार्डन में शुरू हुई एक छोटी-सी वीकेंड एक्टिविटी को धीरे-धीरे दुनिया की पहली “स्कूल ऑफ़ ट्रीज़ (पेड़ों की पाठशाला)” में बदल देती है- जहां पढ़ाई किताबों से नहीं, सीधे प्रकृति से होती है।
हर शनिवार और रविवार, क्लास 2 से 10 तक के बच्चे दो घंटे की हैंड्स-ऑन लर्निंग के लिए इकट्ठा होते हैं। यहां 75 फीसदी प्रैक्टिकल और सिर्फ 25 फीसदी आसान थ्योरी होती है। न कोई क्लासरूम, न ब्लैकबोर्ड और न ही लंबा लेक्चर- बस पेड़, मिट्टी, बीज, धूप और बच्चों के ढेर सारे सवाल।
पहले ही सेशन में करीब 40 उत्साहित बच्चे पहुंच गए। रोहित मेहरा ने शुरुआत एक साधारण लेकिन सोचने पर मजबूर कर देने वाले सवाल से की-“इंसान और पेड़ में क्या फर्क है?” यहीं से पत्तियों को ध्यान से देखने, पौधों को पहचानने, अलग-अलग तरह के पेड़ों को समझने और मज़ाक-मज़ाक में सीखने का सिलसिला शुरू हुआ। वे मुस्कुराकर कहते हैं, “उनकी आँखें एक अलग तरह से खुलती हैं।”
बच्चों ने जाना कि पत्तियां सूरज की रोशनी का पीछा कैसे करती हैं, पेड़ हवा को कैसे महसूस करते हैं, जड़ें बिना रुके अपना काम क्यों करती रहती हैं और मरने के बाद भी पेड़ धरती को कुछ न कुछ क्यों देते रहते हैं। सहजन के पौधों के बारे में सीखने के बाद तो कई बच्चे अगले ही दिन घर से पत्तियां लेकर आ गए- अपनी नई खोजों पर गर्व के साथ।
हर सेशन जिज्ञासा से भरे सवालों से गूंजता
- सबसे बड़ी पत्ती किस पेड़ की होती है?
- किस पेड़ में बीज नहीं होता?
- पेड़ के अंदर पानी ऊपर तक कैसे पहुंचता है?
- समुद्र के पौधों को मिट्टी की जरूरत क्यों नहीं पड़ती?
यहां बच्चे सीड बॉल बनाते हैं, कप में बीज बोते हैं, कई दिनों तक अंकुरण को देखते हैं और पेड़ों के नीचे बसने वाली उस छोटी-सी दुनिया को खोजते हैं, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। जो पहल एक सोसाइटी गार्डन से शुरू हुई थी, वह अब कई लोगों को प्रेरित कर रही है। रोहित मेहरा का सपना है कि यह विचार पूरे भारत में फैले और एक दिन स्कूलों में हर हफ्ते कम से कम दो घंटे पेड़ों के बारे में सीखने के लिए तय हों।
यह कोई औपचारिक स्कूल नहीं है। यह बस एक बगीचा है, कुछ जिज्ञासु बच्चे और दो लोग- रोहित और गीतांजलि मेहरा- जो मानते हैं कि असली शिक्षा उसी दिन शुरू होती है, जब बच्चा अपने आस-पास खड़े पेड़ों को पहचानना सीख लेता है।
