250 साल बाद केरल में फिर सजा कुंभ का महापर्व, चुनाव से ठीक पहले भक्ति का महापर्व
punjabkesari.in Saturday, Jan 31, 2026 - 10:08 PM (IST)
नेशनल डेस्कः रात के अंधेरे में दीपों की रोशनी चमक रही है, वैदिक मंत्र लगातार गूंज रहे हैं और हजारों श्रद्धालु पवित्र नदी में स्नान कर रहे हैं। भगवा वस्त्र पहने साधु-संतों का विशाल जमावड़ा नदी किनारे दिखाई दे रहा है। यह नजारा उत्तर भारत का नहीं, बल्कि केरल का अपना कुंभ मेला है, जिसे महामाघ महोत्सवम कहा जाता है।
करीब 250 साल बाद यह ऐतिहासिक धार्मिक आयोजन “भगवान की अपनी धरती” केरल में लौट आया है। उत्तर भारत के प्रसिद्ध कुंभ से प्रेरित इस मेले को “दक्षिण भारत का कुंभ मेला” भी कहा जा रहा है। इसका भव्य शुभारंभ 18 जनवरी को भरतपुझा नदी के किनारे हुआ, जिसे लोग ‘दक्षिण गंगा’ भी कहते हैं। इस नदी का एक और नाम नीला भी है।
पिछले दो हफ्तों में दसियों हजार श्रद्धालु यहां आ चुके हैं। यह मेला कुल 18 दिनों तक चलेगा और केरल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आयोजित किया गया है। इसी वजह से कुछ राजनीतिक जानकार इसे सत्तारूढ़ लेफ्ट फ्रंट सरकार का ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ संदेश भी बता रहे हैं, क्योंकि सरकार कांग्रेस-नेतृत्व वाले यूडीएफ से कड़ी चुनौती का सामना कर रही है।
केरल कुंभ की वापसी की कहानी
इस महायज्ञ को फिर से जीवित करने का विचार स्वामी आनंदवन भारती महाराज का था। दिलचस्प बात यह है कि वे पहले CPI(M) की छात्र इकाई के नेता रह चुके हैं और अब जुना अखाड़ा के वरिष्ठ संत हैं—जो भारत के सबसे पुराने और बड़े साधु अखाड़ों में से एक है। प्रयागराज कुंभ के दौरान उन्हें दक्षिण भारत का महामंडलेश्वर नियुक्त किया गया था। इसके बाद उन्होंने केरल में भी इसी तरह के विशाल धार्मिक समागम की जरूरत पर जोर दिया।
इस भव्य आयोजन के मुख्य संरक्षक हैं— माता अमृतानंदमयी (अम्मा), केरल के देवस्वम मंत्री वी.एन. वासवन। सरकार और संतों के संयुक्त प्रयासों से यह कार्यक्रम पिछले दो साल से तैयार किया जा रहा था।
राज्यपाल ने किया उद्घाटन
18 जनवरी को केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने मेले का औपचारिक उद्घाटन किया। उन्होंने एक पारंपरिक झंडा फहराया, जिसे अंगदिप्पुरम अलीपरंबा कलारी से भव्य जुलूस के साथ लाया गया था। अपने भाषण में राज्यपाल ने कहा कि यह आयोजन सनातन धर्म की जीवंत परंपरा को पुनर्जीवित कर रहा है, लेकिन इसे किसी धर्म के खिलाफ नहीं देखा जाना चाहिए।
250 साल पहले क्यों रुका था यह मेला?
यह कुंभ मेला मामनकम मैदान में हो रहा है, जो ऐतिहासिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। मध्यकाल में यहां हर 12 साल में एक भव्य उत्सव होता था, जिसमें धार्मिक अनुष्ठान, सांस्कृतिक कार्यक्रम और युद्ध कौशल प्रदर्शन शामिल होते थे। लेकिन ब्रिटिश शासन के दौरान इस परंपरा को रोक दिया गया। स्वामी आनंदवन भारती के अनुसार—“करीब 270 साल पहले अंग्रेजों ने इस आयोजन को बंद कर दिया था। आजादी के बाद 2–3 बार इसे पुनर्जीवित करने की कोशिश हुई, लेकिन निरंतरता नहीं बनी।” प्रयागराज महाकुंभ के बाद ही इसे बड़े पैमाने पर फिर से आयोजित करने का अंतिम निर्णय लिया गया।
भरतपुझा के किनारे हर शाम ‘नीला आरती’
हर शाम सूर्यास्त के बाद नदी का किनारा रोशनी और भक्ति से जगमगा उठता है। वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर के पुजारी यहां आकर ‘नीला आरती’ करते हैं, जो गंगा आरती की तरह ही भव्य होती है। बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने ट्वीट कर कहा—“इस पवित्र आयोजन को अपनी जन्मभूमि के पास भरतपुझा नदी पर लौटते देखना भावुक कर देने वाला है।”
सरकार की तैयारियां और सुरक्षा व्यवस्था
केरल सरकार ने इस आयोजन को सफल बनाने के लिए बड़े इंतजाम किए हैं—
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300 से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात
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बम निरोधक दस्ता मौके पर मौजूद
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मुख्य यज्ञ स्थल में प्रवेश से पहले कड़ी जांच
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KSRTC की 100 से ज्यादा विशेष बस सेवाएं
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रेलवे ने वाराणसी और ऋषिकेश से एर्नाकुलम तक विशेष ट्रेनें चलाईं
विवाद: अस्थायी पुल को लेकर झगड़ा
कार्यक्रम से पहले बड़ा विवाद भी हुआ। राजस्व विभाग ने नदी पर बन रहे अस्थायी पुल के निर्माण पर रोक लगा दी थी। आयोजकों ने आरोप लगाया कि यह मेला रोकने की साजिश है। बीजेपी नेता कुम्मनम राजशेखरन ने कहा— “बिना चेतावनी काम रोकना साफ साजिश है, ताकि श्रद्धालुओं का मनोबल टूटे।” हालांकि, चुनाव नजदीक होने के कारण सरकार ने बाद में मामला सुलझाया और पुल निर्माण की अनुमति दे दी।
