आज है ‘भारत रत्न’ और ‘पंचशील’ सिद्धांत के प्रतिपादक पं. नेहरू की Death Anniversary

punjabkesari.in Friday, May 27, 2016 - 12:15 PM (IST)

स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवबर, 1889 को इलाहाबाद में हुआ। उन्होंने 6 बार कांग्रेस अध्यक्ष का पद (लाहौर 1929, लखनऊ 1936, फैजपुर 1937, दिल्ली 1951, हैदराबाद 1953 और कलकत्ता 1954) सुशोभित किया। 
 
 
हैरो और कैब्रिज में पढ़ाई कर  1912 में नेहरू जी ने बार-एट-लॉ की उपाधि ग्रहण की। 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में नेहरू जी 9 अगस्त, 1942 को बंबई में गिरफ्तार हुए और अहमदनगर जेल में रहे, जहां से 15 जून, 1945 को रिहा किए गए। 
आजादी के पहले गठित अंतरिम सरकार में और आजादी के बाद 1947 में भारत के प्रधानमंत्री बने और 27 मई, 1964 को अपने निधन तक इस पद पर बने रहे।  लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करना, राष्ट्र और संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को स्थायी भाव प्रदान करना और योजनाओं के माध्यम से देश की अर्थव्यवस्था को सुचारु करना आदि उनके कार्यकाल के मुख्य उद्देश्य रहे।
 
 
पंडित नेहरू शुरू से ही गांधी जी से प्रभावित रहे और 1912 में कांग्रेस से जुड़े। 1920 के प्रतापगढ़ के पहले किसान मोर्चे को संगठित करने का श्रेय उन्हीं को जाता है। 1928 में लखनऊ में साइमन कमीशन के विरोध में नेहरू घायल हुए और 1930 के नमक आंदोलन में गिरफ्तार हुए। उन्होंने 6 मास तक जेल में रहे।
 
 
1935 में अलमोड़ा जेल में ‘आत्मकथा’ लिखी। उन्होंने कुल 9 बार जेल यात्राएं की और अंतर्राष्ट्रीय नायक के रूप में पहचाने गए। पं.नेहरू ने पंचशील का सिद्धांत प्रतिपादित किया और 1955 में ‘भारत रत्न’ से अलंकृत हुए। नेहरू जी ने तटस्थ राष्ट्रों को संगठित किया और उनका नेतृत्व किया।
 
 
1929 में जब लाहौर अधिवेशन में गांधी जी ने नेहरू को अध्यक्ष पद के लिए चुना था, तब से 35 वर्षों तक, 1964 में प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए मृत्यु तक, 1962 में चीन से हारने के बावजूद, नेहरू अपने देशवासियों के आदर्श बने रहे। राजनीति के प्रति उनका धर्मनिरपेक्ष रवैया था। वह सामाजिक उदारवादी थे, वह न सिर्फ देश के प्रथम प्रधानमंत्री चुने गए। उन्हें सबसे लंबे समय तक विश्व के सबसे विशाल लोकतंत्र की बागडोर संभालने का गौरव भी हासिल  हुआ। 
 
 
धर्मनिरपेक्षता और भारत की जातीय तथा धार्मिक विभिन्नताओं के बावजूद देश की मौलिक एकता पर जोर देने के अलावा नेहरू जी भारत को वैज्ञानिक खोजों और तकनीकी विकास के आधुनिक युग में ले जाने के प्रति भी सचेत थे। साथ ही उन्होंने अपने देशवासियों में निर्धनों तथा दलितों के प्रति सामाजिक चेतना की जरूरत के प्रति जागरुकता पैदा करने और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सम्मान पैदा करने का भी कार्य किया।  
 
 
उन्होंने प्राचीन हिन्दू सिविल कोड में सुधार करके अंतत: उत्तराधिकार तथा संपत्ति के मामले में विधवाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार प्रदान करवाया। चीन के साथ संघर्ष के कुछ ही समय बाद नेहरू के स्वास्थ्य में गिरावट के लक्षण दिखाई देने लगे। 

उन्हें 1963 में दिल का हल्का दौरा पड़ा, जनवरी 1964 में उन्हें और दुर्बल बना देने वाला दौरा पड़ा और फिर कुछ ही महीनों के बाद तीसरे दौरे में 27 मई 1964 को उनका निधन हो गया। 


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