ईरान मुद्दे पर ट्रंप ने पाकिस्तान को किया साइडलाइन, फिर भी इस्लामाबाद की कूटनीतिक कोशिशें जारी

punjabkesari.in Tuesday, Aug 04, 2026 - 09:23 PM (IST)

वाशिंगटन/इस्लामाबाद: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने की कोशिशों के बीच पाकिस्तान को एक बड़ा कूटनीतिक झटका लगा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ संभावित बातचीत में मदद करने वाले देशों की सूची से पाकिस्तान का नाम पूरी तरह से गायब कर दिया है। जहां एक ओर वाशिंगटन ने पाकिस्तान की भूमिका को नजरअंदाज किया, वहीं दूसरी ओर बौखलाए इस्लामाबाद ने अपनी प्रासंगिकता साबित करने के लिए आनन-फानन में ईरानी नेतृत्व को न्योता भेज दिया है।

सऊदी और कतर को मिली तवज्जो
सोमवार को व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने खुलासा किया कि वे ईरान के अनुरोध पर बातचीत के लिए तैयार हैं। दिलचस्प बात यह रही कि ट्रंप ने इस प्रक्रिया में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और विशेष रूप से कतर की भूमिका की सराहना की, लेकिन महीनों से मध्यस्थ बनने का दावा करने वाले पाकिस्तान का जिक्र तक नहीं किया। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह ईरान के लिए समझौता करने का "आखिरी मौका" है।

ईरान अब भी पाकिस्तान के साथ 
ट्रंप के दावों के उलट, तेहरान ने वाशिंगटन के साथ किसी भी नई बातचीत से इनकार किया है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने साफ किया कि उनके लिए पाकिस्तान ही मुख्य मध्यस्थ है। उन्होंने कहा, "ईरान और अमेरिका से संबंधित मुद्दों में पाकिस्तान एक मध्यस्थ है और कतर भी जरूरत पड़ने पर मदद करता है।" तेहरान का रुख स्पष्ट है कि इस बातचीत में कोई "नया मध्यस्थ" शामिल नहीं हुआ है।

पाकिस्तान की 'न्योता कूटनीति'
अमेरिका द्वारा दरकिनार किए जाने के तुरंत बाद, पाकिस्तान ने सक्रियता दिखाते हुए ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर घलीबाफ को तत्काल इस्लामाबाद आने का निमंत्रण दिया है। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के अनुसार, डिप्टी पीएम इशाक डार ने ईरानी समकक्ष से फोन पर बात की और क्षेत्रीय विकास पर चर्चा के लिए उन्हें आमंत्रित किया। जानकारों का मानना है कि ट्रंप की अनदेखी के बाद पाकिस्तान यह दिखाना चाहता है कि वह अब भी इस खेल का मुख्य खिलाड़ी है।

पुरानी कोशिशों पर फिरा पानी?
पाकिस्तान पिछले कई महीनों से पर्दे के पीछे की कूटनीति में लगा हुआ था। उसने जून में एक समझौता ज्ञापन (MoU) तैयार करने में भी मदद की थी, जिसने दोनों पक्षों को स्थायी समाधान के लिए 60 दिनों का समय दिया था। हालांकि, वह समझौता विफल रहा और अब ट्रंप की हालिया टिप्पणी ने पाकिस्तान की भूमिका पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

अब देखना यह होगा कि क्या पाकिस्तान भविष्य की वार्ताओं के केंद्र में अपनी जगह वापस बना पाता है या खाड़ी देश इस कूटनीतिक दौड़ में बाजी मार ले जाएंगे।


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Content Writer

Pardeep

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