सेट पर महसूस हुई द्वारका की दिव्यता, गजरे के महक व आध्यात्मिक महौल ने बनाया खास- संस्कृति जयाना

punjabkesari.in Tuesday, May 19, 2026 - 09:56 AM (IST)

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। ‘कृष्णावतारम – पार्ट वन: द हर्ट (हृद्यम)’ माइथोलॉजी ड्रामा की पारंपरिक शैली से हटकर, एक बेहद नाजुक और भावनात्मक तरीके से भगवान श्रीकृष्ण के जीवन को पर्दे पर पेश करती है। इस फिल्म में सिद्धार्थ गुप्ता,संस्कृती जयाना, सुष्मिता भट्ट और निवाशीनी कृष्णन मुख्य भूमिका में नजर आ रहे हैं। फिल्म 8 मई को सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी। फिल्म के बार में सिद्धार्थ गुप्ता और संस्कृती जयाना ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...

सवाल: इस फिल्म के  कॉस्टयूम्स  और किरदार के बारे में क्या खासियत रही?

सिद्धार्थ: पहले तो कॉस्टयूम के लिए हमारे स्टाइलिस्ट का बहुत बड़ा श्रेय जाता है। उन्होंने हमें जो कपड़े पहनाए, वो बहुत ही ऑथेंटिक और इंपैक्टफुल थे। और जहां तक मेरे कैरेक्टर की बात है, कृष्ण का तो पूरी दुनिया जानती है। उनके बारे में कहना बहुत आसान नहीं है। मेरे हिसाब से कृष्ण सबसे ऑबजेक्टिविटी वाले इंसान थे जिन्होंने पृथ्वी पर जन्म लिया। उन्होंने खुद कहा कि मैं भगवान हूं। उनके जीवन में कर्मयोग का जो सिद्धांत था, वो बिल्कुल अद्भुत था।

संस्कृति: मेरे लिए सत्यभामा का किरदार बहुत खास था। ये केवल कृष्ण की पत्नी नहीं थीं, बल्कि उन्होंने अपने जीवन में बहुत ट्रांसफॉर्मेशन किया। वह माता भू देवी की अवतार थीं और साथ ही flawed human being भी थीं। उन्होंने बिना शर्त प्रेम का अनुभव किया और यही सफर बहुत इंस्पायरिंग रहा।

सवाल: सत्यभामा के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। फिल्म में आपने जो पर्सपेक्टिव दिखाया है, वो काफी फ्रेश और शिक्षाप्रद है।

संस्कृति: बिल्कुल। इस फिल्म के माध्यम से हम लोगों तक सत्यभामा की कहानी पहुंचा रहे हैं। उन्होंने भी कृष्ण से गहरा प्रेम किया और उसी प्रेम से बहुत कुछ सीखा। बहुत लोगों को यह पता नहीं है कि हम छोटी दिवाली क्यों मनाते हैं – राम ने रावण का वध किया, और कृष्ण ने सत्यभामा के साथ नरकासुर का वध किया। इस तरह की अनकही कहानियां इस फिल्म के माध्यम से सामने आई हैं।

सवाल: अगर असल जीवन में आपके सामने भी कोई ऐसा चॉइस आता  प्यार या सत्य तो आप क्या चुनती?

संस्कृति: सच बताऊं तो मैं असल जीवन में प्रेम को ज्यादा चुनती। जिससे हम प्यार करते हैं, उनके लिए हम खड़े रहते हैं और उन्हें माफ भी करते हैं। लेकिन इस फिल्म ने मुझे यह सिखाया कि सत्यभामा हमेशा सही के लिए खड़ी रहती थीं। मुझे लगा कि उनके किरदार से मुझे भी हिम्मत मिली, और हर औरत में यह ताकत होनी चाहिए।

सवाल: फिल्म में देखा गया कि आपके नाम की जगह सेट पर कैरेक्टर का नाम लिखा गया। यह अनुभव कैसा रहा?

संस्कृति: बहुत ही अलग और खास। हमने किरदार को जीने की कोशिश की और खुद को किसी भी चीज़ से डिस्ट्रैक्ट नहीं होने दिया। कृष्ण भगवान को कभी अपने से अलग नहीं माना। मेरे पिता ने भी मेरा नाम अपने फोन में सत्यभामा करके सेव किया। मेरे लिए यह बहुत गर्व की बात थी।

सवाल: आपने अपने किरदार में रोमांस, एक्शन और डांस – सब कुछ निभाया। आपके लिए यह कितना चैलेंजिंग था?

संस्कृति: सच बताऊं तो , मुझे शुरुआत में यह पता नहीं था कि चैलेंजिंग होगा। लेकिन मैं फ्लो में था। हमारे डायरेक्टर ने मुझ पर विश्वास रखा और उन्होंने बहुत कुछ करवाया जिससे यह संभव हुआ। एक्टिंग और स्टोरीटेलिंग का पैशन भी बहुत मददगार रहा।

सवाल: फिल्म में "नदी एक है, घाट अनेक हैं" वाली बात आपके लिए क्या मायने रखती है?

संस्कृति: यह कॉन्सेप्ट बहुत गहरा है। यह केवल रोमांटिक कनटैकस्ट में नहीं बल्कि जीवन के कई पहलुओं में लागू होता है। आज के समय में relationships अलग हैं, और हम कृष्णा का सफर आज के समय के साथ सीधा कंपेयर नहीं कर सकते।

सवाल: क्या कृष्ण भगवान के जमाने को आज से कुछ कंपेयर कर सकते है?

सिद्धार्थ: बिल्कुल नहीं क्योंकि श्री  कृष्ण भगवान और उनकी आठों भार्याओं का कॉन्टेक्स्ट अलग था। आज की दुनिया में यह apply नहीं होता, लेकिन फिल्म के माध्यम से हमें यह समझ में आता है कि प्रेम एक प्योर और डिवाइन इमोशन है, जो भौतिक क्षेत्र से परे है।

सवाल: आपका सेट का अनुभव कैसा रहा?
संस्कृति:
सेट पर जो एनर्जी थी, वह बेहद शांत और धार्मिक थी। गजरे की महक और वातावरण ने हमें पूरी तरह इमर्स कर दिया। हमें लग रहा था कि हम द्वारका में हैं, केवल सेट पर नहीं।

सवाल: एक एक्टर पर फ्यूचर में रोल सिलेक्ट करने का भार आता है। आप इस भार को कैसे लेते हैं?

सिद्धार्थ: हां, बिल्कुल। शुरुआत में एक एक्टर को अपने रोल्स को लेकर काफी सोच-समझकर फैसले लेने पड़ते हैं। वैसे तो हमारा काम हर तरह के किरदार को निभाना होता है, लेकिन कुछ फिल्में और किरदार आपकी सोच और पर्सनैलिटी पर भी असर डालते हैं। ऐसे में नैचुरली आप वही चुनना करना चाहते हैं जो आपके बिलिफ और वैल्यूस से मेल करें। साथ ही, जिन लोगों ने किसी किरदार और फिल्म से इतना प्यार दिया है, उनके भावनाओं की इज्जत करना भी ज़रूरी होता है। इसलिए आगे रोल्स चुनते समय एक फिल्टर तो रहेगा, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि खुद को सीमित कर लिया जाए। एक एक्टर का काम अलग-अलग कहानियां और नए किरदार दर्शकों तक लाना है ताकि वह खुद भी monotonous महसूस न करे और दर्शकों को भी कुछ नया देखने को मिले।

सवाल: आपकी पसंदीदा चीज़ फिल्म में क्या थी?

सिद्धार्थ: सबसे प्रिय तो कृष्ण ही है। उस closeness और भाव को महसूस करना मेरे लिए सबसे खास था।
संस्कृति: मेरे लिए भी सत्यभामा का सफर सबसे प्रिय था। उनका नाम और उनकी कहानी मेरे लिए बहुत खास है।

 


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Content Editor

Manisha

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