Interview: सीरीज के असली सितारे बच्चे, मासूमियत ही शो की असली ताकत
punjabkesari.in Thursday, Jul 23, 2026 - 03:30 PM (IST)
नई दिल्ली/टीम डिजिटल। हिमांक गौर के निर्देशन में बनी कॉमेडी-ड्रामा सीरीज ‘आदर्श बाल विद्यालय’ 24 जुलाई को प्राइम वीडियो पर रिलीज हो रही है। सीरीज की कहानी का केंद्र बिन्दु एक सरकारी स्कूल है जिसमें कई अव्यवस्थाएं है जिसके हेड मास्टर को इन्हें दूर कर के स्कूल को टॉप 10 स्कूलों में लाना है। सीरीज में केके मेनन, अर्चना पूरन सिंह, नवीन कस्तूरिया, प्रसन्ना बिष्ट, देवेन भोजानी, अजितेश गुप्ता, अन्नपूर्णा सोनी, प्राची शाह और अभिमन्यु सिंह नजर आएंगे। सीरीज के बारे में केके मेनन, नवीन कस्तूरिया, अर्चना पूरन सिंह, समीर सक्सेना और हिमांक गौर ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...
समीर सक्सेना
सवाल : इस सीरीज का आइडिया आपके दिमाग में कैसे आया? इस विषय पर कहानी बनाने की सोच कहां से आई?
जब हमने इस पर काम शुरू किया तो सबसे पहले यही महसूस हुआ कि भारतीय स्कूलों, खासकर सरकारी स्कूलों की दुनिया पर बहुत कम कहानियां बनी हैं। फिल्मों और वेब सीरीज में अक्सर प्राइवेट स्कूल, उनकी लाइफ, वहां के टीचर्स और स्टूडेंट्स को दिखाया गया है, लेकिन सरकारी स्कूलों की अपनी एक अलग दुनिया है, जिसकी कहानियां अभी तक ठीक तरह से सामने नहीं आई थीं। हमें लगा कि इस दुनिया में बहुत कुछ ऐसा है, जो लोगों ने अपनी जिंदगी में महसूस किया है लेकिन स्क्रीन पर नहीं देखा। यही सोच धीरे-धीरे एक आइडिया में बदली। फिर हमने इस दुनिया को और गहराई से एक्सप्लोर करना शुरू किया। हम ऐसी कहानी बनाना चाहते थे, जिसे बनाने में हमें भी मजा आए और दर्शकों को भी उससे जुड़ाव महसूस हो।
सवाल : क्या किसी खास घटना, वीडियो या वास्तविक इंसिडेंट ने आपको यह कहानी लिखने के लिए प्रेरित किया?
ऐसा कोई एक खास वीडियो या घटना नहीं थी। दरअसल, हम लोग अक्सर बैठकर अपने स्कूल के दिनों की बातें किया करते थे। दोस्तों के साथ जब भी बैठते थे तो स्कूल की शरारतें, टीचर्स, दोस्त, क्लासरूम और बचपन की यादें चर्चा का हिस्सा बन जाती थीं। इन्हीं बातचीत के दौरान हमारे मन में यह विचार आया कि क्यों न उन सभी अनुभवों को एक कहानी का रूप दिया जाए, जिनसे लगभग हर व्यक्ति कभी न कभी गुजरा है। हमने कोशिश की कि कहानी आज के दौर में सेट हो, लेकिन उसमें पुराने स्कूल की यादें भी हों ताकि आज के बच्चे भी उससे जुड़ सकें और जो लोग स्कूल की जिंदगी जी चुके हैं, उन्हें भी अपनी यादें ताजा होती महसूस हों।
हिमांक गौर
सवाल : एक निर्देशक के तौर पर इस सीरीज की कास्टिंग बेहद अलग और दिलचस्प है। आपने कलाकारों का चुनाव किस सोच के साथ किया?
हम हमेशा कोशिश करते हैं कि कास्टिंग ऐसी हो जो दर्शकों को नई लगे। उदाहरण के तौर पर, हम काफी समय से के.के. मेनन सर को एक कॉमेडी सीरीज में देखना चाहते थे। जब स्क्रिप्ट लिखी जा रही थी, तभी से हमारे दिमाग में उनका नाम था। इसी तरह अर्चना पूरन सिंह मैम को लेकर भी हमारी सोच थी कि उन्हें एक बिल्कुल अलग तरह के किरदार में दिखाया जाए। बचपन से हमने उन्हें कई फिल्मों में देखा है और उनकी एक्टिंग हमेशा पसंद की है। हमने उनसे संपर्क किया और खुशी की बात है कि उन्होंने इस किरदार के लिए हामी भर दी। नवीन के किरदार के लिए भी स्क्रिप्ट लिखते समय से ही तय था कि यह भूमिका वही निभाएंगे। हमारी कोशिश यही थी कि हर कलाकार अपने किरदार में बिल्कुल फिट बैठे और दर्शकों को कुछ नया देखने को मिले।
सवाल: आज के समय में लोग सोशल मीडिया पर तो खुश दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तविक जिंदगी में अक्सर खुश नहीं होते। आप लोग इसे कैसे देखते हैं?
अगर आप सच में खुश रहना चाहते हैं, तो सोशल मीडिया से थोड़ी दूरी बनाकर रखिए। आज बहुत-सी चीजें सिर्फ इसलिए की जाती हैं ताकि लोग उन्हें देखें और उनकी तारीफ करें। धीरे-धीरे हम अपनी खुशी दूसरों के Validation पर निर्भर कर देते हैं। असल खुशी अपने परिवार, अपने माता-पिता और अपने करीबी लोगों के साथ समय बिताने में है। जब आप यह समझ जाते हैं कि दिखावे की दुनिया और वास्तविक जिंदगी अलग होती है, तब आप ज्यादा संतुलित और खुश रह सकते हैं। अगर कोई इंसान बिना किसी बनावटी जवाब के यह कह सकता है कि “मुझे नहीं पता, लेकिन मैं खुश हूं”, तो शायद वही सबसे ज्यादा खुश इंसान है।
अर्चना पूरन सिंह
सवाल : इस सीरीज में आपका किरदार कैसा है? क्या आप बच्चों को डांटती हैं या उनका साथ देती हैं?
बच्चों से ज्यादा तो मैं सीरीज में प्रिंसिपल को डांटती हूं। मेरा किरदार बहुत सख्त है और उसमें कई परतें हैं। मैंने अपने करियर में ऐसा रोल पहले कभी नहीं किया। यह एक कॉमेडी सीरीज जरूर है, लेकिन मेरा मकसद लोगों को हंसाना नहीं है। मैं जानबूझकर कोई कॉमिक हरकत नहीं करती। अब तक लोग मुझे ऐसे रोल देते आए हैं जहां मुझे कॉमेडी करनी होती थी, इम्प्रोवाइज करना होता था और हंसी पैदा करनी होती थी। लेकिन इस बार पूरी तरह अलग अनुभव रहा।
मुझे सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि मेकर्स ने मुझ पर भरोसा किया। हमारी इंडस्ट्री में अक्सर कलाकारों को एक ही तरह के किरदारों में बांध दिया जाता है। अगर आपने कॉमेडी की है तो बार-बार वही रोल मिलने लगते हैं। लेकिन एक अभिनेता बहुत कुछ कर सकता है। इसलिए मैं बहुत खुश हूं कि इन लोगों ने मुझमें कुछ अलग देखा और मुझे यह किरदार निभाने का मौका दिया।
सवाल : आपने भी कहा कि कलाकारों को अक्सर एक ही तरह के किरदारों में बांध दिया जाता है। आप इसे किस तरह देखती हैं?
मैं इसे दो नजरियों से देखती हूं। मेरे दोनों बच्चे अमेरिका के एक इंस्टीट्यूट में पढ़े हैं। वहां उनके एक शिक्षक ने एक बहुत अच्छी बात कही थी। उन्होंने कहा था कि अगर एक अभिनेता को बार-बार एक ही तरह के किरदार मिल रहे हैं, तो उसे खुद को भाग्यशाली समझना चाहिए, क्योंकि इसका मतलब है कि उसने उस तरह की भूमिका इतनी अच्छी निभाई है कि लोग उसे दोबारा उसी रूप में देखना चाहते हैं। हॉलीवुड में भी ऐसा ही होता है। लेकिन दूसरा पक्ष यह है कि एक कलाकार होने के नाते हम अपनी रचनात्मकता को अलग-अलग रूपों में दिखाना चाहते हैं। हम नए किरदार निभाना चाहते हैं, नई चुनौतियां लेना चाहते हैं। इसलिए जब हमें बार-बार एक जैसा काम मिलता है तो कहीं न कहीं लगता है कि लोग हमारी दूसरी क्षमताओं को नहीं देख पा रहे।
सवाल: अगर आपको स्कूल शिक्षा प्रणाली में कोई एक बदलाव करने का मौका मिले, तो आप क्या बदलना चाहेंगी?
अगर मुझे मौका मिले तो मैं हर स्कूल में रोज़ दो या तीन फ्री पीरियड जरूर रखूंगी। ऐसे पीरियड, जहां बच्चों पर कोई पढ़ाई या गतिविधि थोप दी जाए, ऐसा नहीं। बल्कि उन्हें पूरी आजादी मिले कि वे जो चाहें करें। कोई बच्चा खेल के मैदान में जाएगा, तो पता चलेगा कि उसकी रुचि खेलों में है। कोई बच्चा फिजिक्स लैब में जाकर प्रयोग करना चाहेगा, तो समझ आएगा कि उसे विज्ञान पसंद है। कोई बच्चा बैठकर चित्र बनाएगा, कोई किताब पढ़ेगा, कोई दोस्तों से बातें करेगा। मुझे लगता है कि बच्चों को अपनी रुचि पहचानने का मौका मिलना चाहिए। आज के बच्चों के पास अपने लिए समय ही नहीं है।
के.के. मेनन
सवाल : आपका किरदार काफी सरप्राइजिंग है दर्शकों ने आपको ऐसे रोल में पहले नहीं देखा। इस किरदार की सबसे खास बात क्या लगी?
मुझे ज्ञानेश्वर का किरदार बहुत प्यारा लगा। इस इंसान के अंदर बहुत मासूमियत है। हालांकि वह पूरी तरह परफेक्ट नहीं है। उसमें थोड़ी-सी स्वार्थी प्रवृत्ति भी है। यानी वह बिल्कुल सफेद या काला नहीं है, बल्कि एक वास्तविक इंसान की तरह लिखा गया है। मुझे सबसे ज्यादा मजा इस किरदार की सादगी और ईमानदारी में आया। लेकिन अगर मैं सच कहूं तो इस सीरीज के असली सितारे बच्चे हैं। जिस तरह की कास्टिंग की गई है, वह कमाल की है। मैंने इससे पहले इतने स्वाभाविक बच्चे किसी सीरीज में नहीं देखे। ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि वे अभिनय कर रहे हैं। वे संवाद बोलते नहीं, बल्कि जीते हैं। उनकी मासूमियत और सहजता पूरी तरह बरकरार है। यही बात इस शो को खास बनाती है।
सवाल: आज भी कई बच्चे स्कूल नहीं पहुंच पाते। मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था होने के बावजूद कई बच्चे पढ़ाई से दूर हैं। आपको क्या लगता है कि इसकी सबसे बड़ी वजह क्या है?
यह कोई ऐसा विषय नहीं है जिसका एक सीधा या आसान जवाब हो। इसके पीछे कई तरह के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक कारण हैं। समाज में जागरूकता, आर्थिक स्थिति, परिवार की परिस्थितियां और शिक्षा के प्रति सोच ये सभी बातें इसमें भूमिका निभाती हैं। इसलिए यह समस्या रातों-रात खत्म नहीं हो सकती। मुझे लगता है कि आज देश में शिक्षा व्यवस्था पहले की तुलना में काफी बेहतर हुई है और धीरे-धीरे इसमें और सुधार होगा। नीति-निर्माता और सरकार इस विषय पर लगातार काम कर रहे हैं। वे वास्तविक परिस्थितियों को हमसे कहीं बेहतर समझते हैं। इसलिए यहां बैठकर कोई एक समाधान बताना सही नहीं होगा।
नवीन कस्तुरिया
सवाल : आपके हर किरदार में गहराई होती है। आप अपने अलग-अलग किरदारों में फर्क कैसे करते हैं?
मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज स्क्रिप्ट होती है। अगर मुझे कहानी और मेरा किरदार पसंद आ जाए तो मैं पूरी ईमानदारी से उसे निभाने की कोशिश करता हूं। मेरा मानना है कि अगर अभिनेता उस पल को पूरी सच्चाई के साथ जी ले, तो किरदार अपने आप बन जाता है। कई लोग सोचते हैं कि अभिनेता खुद किरदार बनाता है, लेकिन मेरा अनुभव यह कहता है कि असल में किरदार स्क्रिप्ट बनाती है। कई बार तो शूटिंग के दौरान ही मुझे धीरे-धीरे समझ आता है कि यह व्यक्ति वास्तव में कैसा है। और कई बार जब पूरी सीरीज या फिल्म रिलीज होती है, तब उसे देखकर महसूस होता है कि यह किरदार आखिरकार बनकर कैसा निकला।
हर सीन में उसके व्यवहार के अलग-अलग पहलू सामने आते हैं और उन्हीं से उसकी पूरी पहचान बनती है। इस सीरीज में मैं एक काउंसलर की भूमिका निभा रहा हूं। लोग उसे शिक्षक समझ सकते हैं, लेकिन वह वास्तव में काउंसलर है। इस किरदार का स्वभाव, उसकी सोच, उसकी भावनाएं और उसकी यात्रा पूरी तरह अलग है। यहां मेरा किरदार काफी शांत, संवेदनशील और सॉफ्ट है।
सवाल : क्या आपको ऐसा लगा कि इंडस्ट्री आपको टाइपकास्ट करने लगी है? क्या आप अलग-अलग तरह के किरदार निभाना चाहते हैं?
ऐसा नहीं है कि कहीं कोई संगठन बैठा है जो तय करता है कि किस अभिनेता को कौन-सा रोल मिलेगा। हर लेखक और निर्देशक अपनी कहानी के हिसाब से कलाकार चुनता है। अगर किसी अभिनेता को किसी खास तरह के किरदार में लोगों ने पसंद किया है, तो स्वाभाविक है कि अगली बार भी निर्माता और निर्देशक उसे उसी तरह की भूमिका में सोचेंगे। अगर आपने किसी शहरी, पढ़े-लिखे या सभ्य इंसान का किरदार निभाया है, तो लोगों के लिए यह कल्पना करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है कि आप किसी गांव के आदमी, अपराधी या बिल्कुल अलग व्यक्तित्व वाले किरदार में कैसे लगेंगे। इसलिए हर अभिनेता की कोशिश रहती है कि वह अलग-अलग तरह के रोल हासिल करे और अपनी छवि को तोड़े। लेकिन मैं इसे शिकायत की तरह नहीं देखता। यह हमारे पेशे का हिस्सा है। हमें खुद अपनी सीमाएं तोड़नी होती हैं।
