Exclusive Interview: सैट पर तनाव नहीं, हंसी-मजाक और खुशी का माहौल जरूरी: रितेश देशमुख

punjabkesari.in Friday, Sep 11, 2026 - 10:53 AM (IST)

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। मराठी सिनेमा की बड़ी सफल फिल्मों में शामिल ‘राजा शिवाजी’ ने बॉक्स ऑफिस पर 130 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई कर शानदार प्रदर्शन किया है। फिल्म में रितेश देशमुख ने अभिनेता के साथ-साथ सह-लेखक, निर्माता और निर्देशक की जिम्मेदारी भी संभाली है, जबकि जेनेलिया डिसूजा भी इस प्रोजेक्ट का अहम हिस्सा हैं। अब यह फिल्म 12 सितंबर को रात 8 बजे स्टार गोल्ड पर प्रीमियर होने जा रही है। इसी सिलसिले में रितेश देशमुख और जेनेलिया डिसूसा ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...


सवाल: 'राजा शिवाजी' में को-राइटर, एक्टर, प्रोड्यूसर और डायरेक्टर की जिम्मेदारी निभाना कितना चुनौतीपूर्ण रहा?

रितेश देशमुख: मुझे लगता है कि यह बहुत अच्छा सवाल है। हर क्राफ्ट का अपना अलग वक्त था। जब मैंने राइटिंग शुरू की तो उसे समझने में काफी समय लगा क्योंकि राइटिंग टीम का हिस्सा होने के नाते आप पूरी फिल्म, हर किरदार और उसके इमोशन के बारे में सोचते हैं। इसलिए सेट पर आने तक मुझे सिर्फ अपनी लाइन ही नहीं, बल्कि हर किरदार की लाइन और उसके पीछे का इमोशन भी अच्छी तरह पता था। बतौर फिल्ममेकर इससे मुझे काफी स्पष्टता मिली कि कौन-सी लाइन किस इमोशन के साथ दर्शकों तक पहुंचनी चाहिए। 

जहां तक प्रोडक्शन की बात है, उसमें 90-95 प्रतिशत जिम्मेदारी जेनेलिया ने संभाली। डायरेक्शन मैं कर रहा था और इसका फायदा बतौर एक्टर भी मिला। मुझे किसी से यह समझने की जरूरत नहीं थी कि डायरेक्टर मुझसे क्या चाहता है, क्योंकि बतौर डायरेक्टर मुझे पता था कि मैं अपने अंदर के एक्टर से क्या चाहता हूं। इसलिए ये सारी जिम्मेदारियां चुनौतीपूर्ण होने के साथ-साथ मेरे लिए काफी मददगार भी रहीं।

सवाल: क्या आने वाली फिल्मों में भी आप इसी तरह एक्टिंग, डायरेक्शन, प्रोडक्शन और राइटिंग की सारी जिम्मेदारियां एक साथ निभाएंगे?

रितेश देशमुख: नहीं, ऐसा जरूरी नहीं है। मैं उम्मीद करता हूं कि कभी ऐसी फिल्म भी करूं जिसमें मैं एक्ट न करूं। मैं सिर्फ एक फिल्म का राइटर-डायरेक्टर बनना चाहूंगा। प्रोड्यूसर की पूरी जिम्मेदारी जेनेलिया संभाल लें और एक्टिंग भी वही कर लें। मतलब मैं फिल्म में न रहूं तो शायद मेरे लिए ज्यादा बेहतर होगा। 

जेनेलिया डिसूजा
सवाल: मैंने कई लोगों से सुना है कि प्रोडक्शन एक थैंकलेस जॉब है। आप खुद प्रोड्यूसर हैं, तो बताइए कि ऐसा क्यों कहा जाता है?

जेनेलिया डिसूजा: यह 100 प्रतिशत एक थैंकलेस जॉब है। जैसे एक मां का काम थैंकलेस होता है, उसी तरह प्रोडक्शन भी ऐसा ही काम है। फिल्म सेट पर प्रोडक्शन डिपार्टमेंट शायद सबसे ज्यादा मेहनत करता है, लेकिन उसका क्रेडिट बहुत कम दिखाई देता है। अगर शिफ्ट सुबह 6 बजे की है तो आपको 4 या 4:30 बजे पहुंचना पड़ता है और सिर्फ खुद समय पर पहुंचना ही नहीं, बल्कि 200-300 लोगों की पूरी यूनिट को मैनेज करना होता है। अगर शूटिंग समय पर शुरू करनी है तो प्रोडक्शन का मजबूत होना बहुत जरूरी है।

हालांकि, प्रोडक्शन की सबसे खूबसूरत बात यह है कि अगर आप ऐसा माहौल बना पाते हैं जहां डायरेक्टर, एक्टर्स और पूरी टीम खुश हो और दोबारा आपके सेट पर आने का इंतजार करे, तो वही सबसे बड़ी gratification होती है। 'राजा शिवाजी' जैसी फिल्म पूरी करने के बाद बतौर प्रोड्यूसर खुशी अलग होती है, क्योंकि शूटिंग के साथ कई विभागों, लोगों और परिस्थितियों को संभालना पड़ता है। जब आखिर में पीछे मुड़कर देखते हैं कि आपने यह सब संभाल लिया, तब लगता है कि सारी मेहनत वाकई इसके लायक थी।

रितेश देशमुख
सवाल: प्रोडक्शन में सबसे मुश्किल काम शायद 'ना' कहना भी होता है। क्या आप इससे सहमत हैं?

रितेश देशमुख: बिल्कुल। प्रोडक्शन में सबसे मुश्किल काम होता है किसी को यह कहना कि 'यह संभव नहीं है।' प्रोडक्शन डिपार्टमेंट सबसे ज्यादा काम करता है और अक्सर वही लोगों को 'ना' कहता है। उदाहरण के लिए अगर कोई कहता है कि मुझे 2,000 घोड़े चाहिए तो प्रोडक्शन को कहना पड़ेगा कि बजट नहीं है, 500 घोड़े ले लीजिए। सामने से जवाब आता है कि नहीं, कम से कम 700 तो चाहिए। फिर प्रोडक्शन को हर चीज का इंतजाम करना पड़ता है। कभी ऐसा भी होता है कि 500 घोड़े मंगाए गए, लेकिन उनमें से कुछ बीमार हो गए या आ नहीं पाए। इसलिए प्रोडक्शन का काम अक्सर 'ना' कहना होता है। और जब वे किसी चीज के लिए 'हां' कहते हैं तो उसकी उतनी वाहवाही नहीं होती। इसीलिए इसे थैंकलेस जॉब कहा जाता है। 

सवाल: 'राजा शिवाजी' में आप दोनों के बेटे भी नजर आ रहे हैं और वे फिल्म में आपके छोटे रूप का किरदार निभाते हैं। उनका आइडिया किसका था?

रितेश देशमुख: यह आइडिया शानदार था या नहीं, यह तो पता नहीं, लेकिन हमारे डायरेक्शन डिपार्टमेंट की पूरी टीम और EDIS के चीफ एडिटर चारुल ने इस बारे में सोचा था। वह मुझसे काफी झिझकते हुए पूछ रहे थे कि ऐसा करें या वैसा करें। फिर उन्होंने मुझे पूरा आइडिया समझाया और बताया कि उनका लुक किस तरह का होगा। उन्होंने अपने हिसाब से AI की मदद से एक लुक तैयार किया था। क्योंकि फिल्म में मेरा किरदार करीब 45 मिनट बाद आता है, इसलिए हमारे चीफ एडिटर के हिसाब से उस किरदार में कुछ रिजेम्बल होना जरूरी था। हमने इस बारे में सोचा और लगा कि यह बहुत ज्यादा मुश्किल काम नहीं है, तो हमने इसे करने का फैसला किया। मुझे लगा कि बच्चों ने बहुत अच्छा काम किया और बतौर डायरेक्टर मैं उनसे खुश था। 

सवाल: आपके दोनों बेटे सेट पर आपके सामने थे। क्या वे काफी मस्ती करते थे या आपसे थोड़े इंटिमिडेट भी रहते थे?

रितेश देशमुख: नहीं, मैं नहीं मानता कि ऐसा कोई इंटिमिडेशन था। मेरा हमेशा से मानना है कि सेट का माहौल हंसी-मजाक और खुशी वाला होना चाहिए और उसी माहौल में काम निकलना चाहिए। अगर सेट पर तनाव का माहौल होगा तो उस ऊर्जा का असर काम पर भी पड़ेगा। इसलिए हमारे सेट पर हमेशा एक खुशनुमा माहौल था। जो भी तनाव था, वह प्रोडक्शन टीम के बाहर नहीं आता था। वह कभी हमारे तक नहीं पहुंचा। पीछे एक तरह का वॉर रूम चलता रहता था, जहां सारी चीजें संभाली जा रही थीं, लेकिन उसका तनाव हम तक कभी फिल्टर होकर नहीं आया। 

सवाल: फिल्म की कास्टिंग की बात करें तो आप दोनों कितने इन्वॉल्व थे? सबसे आसानी से कौन-सा कलाकार फिल्म का हिस्सा बनने के लिए तैयार हो गया और किसे मनाने में थोड़ा समय लगा?

रितेश देशमुख: सबसे पहले अभिषेक बच्चन थे। मैंने उनसे कहा कि मैं एक फिल्म डायरेक्ट कर रहा हूं और उन्होंने बिना ज्यादा कुछ जाने ही 'डन' कह दिया।
हां, बिना कुछ जाने। उन्हें किरदार तक नहीं पता था। दूसरे सलमान भाई थे। उन्होंने खुद मुझसे कहा कि आप 'राजा शिवाजी' कर रहे हैं, मेरा रोल क्या है? उस समय तक मैं सोच रहा था कि यह कैसे होगा। लेकिन उन्होंने कहा कि आप मेरे बिना फिल्म नहीं कर सकते। यह उनका बड़प्पन है। बोमन ईरानी भी फिल्म का हिस्सा बनना चाहते थे। मुझे याद है कि मैं 'वेड' कर रहा था और उस समय उनकी डेट मैच नहीं हुई थी। फिर मैंने उनसे कहा कि एक रोल है, मैं इसे आपके साथ करना चाहता हूं। दो बार डेट्स की वजह से चीजें आगे-पीछे हुईं, लेकिन तीसरी बार उन्होंने अपनी डेट मैनेज की और फिल्म के लिए आए। विद्या के साथ भी मैंने पूरी कहानी शेयर की। उन्होंने कहानी सुनी और वह बहुत महत्वपूर्ण भूमिका थी। वह एक बड़ी स्टार हैं और उनके किरदार की फिल्म में बहुत अहमियत थी। फरदीन खान को भी हमने इसलिए कास्ट किया क्योंकि मुझे लगा कि शाहजहां के किरदार के लिए उनकी उम्र, गरिमा और व्यक्तित्व काफी सही बैठता है। वह उस शहंशाह का दर्जा और डिग्निटी किरदार में ला सकते थे। संजय सर जैसे कलाकार का फिल्म में होना हमारे लिए बहुत बड़ी बात थी। वह बहुत व्यस्त थे। उन्होंने अपनी मौजूदा डेट्स में से समय निकाल-निकालकर हमें दिया और हमने उन्हीं के हिसाब से चीजें मैनेज कीं। इस तरह इन सभी कलाकारों का फिल्म का हिस्सा बनना हमारे लिए शानदार अनुभव रहा। 


सवाल: इंडस्ट्री की ट्रांजेक्शनल दुनिया में आप दोनों अपनी दोस्तियां कैसे निभाते हैं?

रितेश देशमुख: मुझे लगता है कि जब हम इंडस्ट्री में आए थे, उस समय रिश्ते व्यक्तिगत स्तर पर बनते थे। ऐसा नहीं है कि आपका हर किसी के साथ बनता ही हो, लेकिन मुझे अपने कई कंटेंपरेरीज के साथ काम करने का मौका मिला। अपने सीनियर के साथ भी मैंने काम किया और उनके साथ बहुत दोस्ताना रिश्ते बने।
आज मेरी सलमान खान के साथ अपनी एक अलग और बहुत अच्छी दोस्ती है। शाहरुख खान और अभिषेक बच्चन के साथ भी मेरे बहुत अच्छे रिश्ते हैं। अजय देवगन के साथ मेरा बहुत अच्छा काम और पर्सनल रिश्ते है। अक्षय कुमार के साथ भी मेरा बहुत अच्छा रिश्ता है। विवेक, आफताब, श्रेयस, तुषार और फरदीन सहित बहुत से लोगों के साथ मेरे व्यक्तिगत रिश्ते बने हैं। मुझे नहीं लगता कि हमने कभी अपनी दोस्ती और काम को आपस में मिलाया है। इन रिश्तों के पीछे कोई एजेंडा नहीं था। हम एक-दूसरे की सफलता को खुशी से सेलिब्रेट करते थे और जब जरूरत होती थी तो एक-दूसरे के लिए मौजूद रहते थे। मुझे लगता है कि इसी भावना की वजह से 'राजा शिवाजी' में भी मेरे दोस्त मेरे साथ खड़े हुए और फिल्म का हिस्सा बने। 

जेनेलिया डिसूजा: बिल्कुल। मुझे लगता है कि पहले अगर किसी की फिल्म नहीं चलती थी तो दूसरे लोग भी उसकी असफलता को अपनी असफलता की तरह महसूस करते थे। क्योंकि एक फिल्म बनाने में कितनी मेहनत लगती है, यह हर कोई जानता है। रितेश के बहुत खास दोस्त हैं और मैं खुशकिस्मत हूं कि मैं उनकी जिंदगी में इतनी जल्दी आई कि उनके दोस्तों की जिंदगी का भी हिस्सा बन गई। ये बहुत जेन्युइन और स्वीट फ्रेंडशिप हैं। लोग इंडस्ट्री को जितना खराब बताते हैं, मुझे नहीं लगता कि यह वास्तव में वैसी है। यह एक बहुत खूबसूरत जगह है। यहां आज भी बहुत अच्छाई है। कई बार आपको उन लोगों से भी मदद और सपोर्ट मिलता है, जिनसे आपने इसकी उम्मीद नहीं की होती। लोग आपके लिए अपनी सीमा से आगे जाकर खड़े हो जाते हैं। लेकिन जिस क्षण किसी रिश्ते को ट्रांजेक्शनल बना दिया जाता है, सामने वाला उसे महसूस कर लेता है और फिर वह एक कदम पीछे हट जाता है। आज रितेश और मैं किसी दूसरी इंडस्ट्री को नहीं जानते। हमें इसी इंडस्ट्री से बहुत प्यार है। हमने इसमें अलग-अलग तरह की जिम्मेदारियां निभाई हैं—मैं प्रोड्यूसर बनी, रितेश डायरेक्टर, प्रोड्यूसर और राइटर बने, लेकिन हमें अपना काम और यह पूरा माहौल बहुत पसंद है। मैं खुद इस इंडस्ट्री में एक आउटसाइडर के तौर पर आई थी और मुझे भी बहुत अपनापन मिला। संघर्ष हर इंडस्ट्री में होता है, सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री में नहीं। इसलिए मैं इसे कोई बुरी जगह नहीं मानती। 

सवाल: बहुत से लोग छोटे शहरों से आते हैं। कई एस्पायरिंग राइटर्स और डायरेक्टर्स के पास स्क्रिप्ट होती है, लेकिन उन्हें समझ नहीं आता कि उसे प्रोडक्शन हाउस तक कैसे पहुंचाएं?

रितेश देशमुख: हर निर्माण संस्था की अपनी क्षमता होती है और वह उसी के अनुसार फिल्में बना सकती है। कई बार वह पहले से कुछ परियोजनाओं पर काम कर रही होती है या किसी खास विषय की तलाश में होती है। अभी ऐसा कोई एक तंत्र नहीं है, जहां लेखक अपनी पटकथा सभी निर्माण संस्थाओं तक पहुंचा सके। हमारे पास एक ईमेल पता है, जहां पटकथाएं आती हैं, लेकिन इतनी अधिक पटकथाएं आती हैं कि हर एक को पढ़ पाना संभव नहीं होता। हमारी टीम लगातार स्क्रीप्ट पढ़ती है और उनकी जांच करती है। कुछ दिलचस्प लगता है तो वह हम तक पहुंचता है। मेरी सलाह है कि लेखक अपनी पटकथा या विचार को पटकथा लेखक संघ में जरूर पंजीकृत कराएं। साथ ही यह भी सोचें कि डेढ़-दो साल बाद फिल्म बनने या रिलीज होने तक उनका विचार प्रासंगिक रहेगा या नहीं। उम्मीद है कि आगे चलकर पटकथाओं के लिए भी कलाकारों की तरह एक साझा संग्रह या बेहतर तंत्र बनेगा। हर साल सीमित फिल्में बनती हैं, इसलिए हर पटकथा का चुना जाना संभव नहीं है। मेरा मानना है कि रिलीज होने तक हर फिल्म सफल होती है। फिल्म में कितना दम है, यह रिलीज के बाद ही पता चलता है। तब तक हर फिल्मकार को यही लगता है कि वह एक अच्छी फिल्म बना रहा है।


सवाल: आप दोनों की पहली फिल्म 2003 में आई थी। उसके बाद आपने कई फिल्मों में साथ काम किया, लेकिन बीच में एक लंबा अंतराल भी रहा। इतने सालों में क्या बदला और क्या चीज आज भी बिल्कुल वैसी ही है?

जेनेलिया डिसूजा: हम निश्चित रूप से बदले हैं। बतौर एक्टर्स, हमारी जिम्मेदारियां और जिंदगी में बहुत कुछ बदला है। लेकिन एक चीज जो बिल्कुल नहीं बदली, वह है एक-दूसरे की कंपनी को एंजॉय करना।

रितेश देशमुख: मैं आपको बताता हूं। मैंने जेनेलिया के साथ बतौर को-एक्टर काम तब शुरू किया था, जब हम दोनों को ठीक से पता भी नहीं था कि कैमरा क्या होता है, लाइट क्या होती है और परछाई कहां से आती है। हम उस समय मैगजीन के दौर में थे। फिल्म की शूटिंग के दौरान 200 फीट के नेगेटिव का दौर था। हमने वह सब देखा है। वहीं से हमारी शुरुआत हुई। हम उस समय एक मैगजीन का हिस्सा भी थे। हां, उस दौर से लेकर आज तक हमने बहुत कुछ बदलते हुए देखा है। बाद में साउंड का दौर आया और फिर टेक्नोलॉजी लगातार बदलती गई। उस समय हम बस मजा करते हुए काम करते थे। मुझे याद है, एक बार डायरेक्टर ने ओके कहा तो जेनेलिया ने कहा था, 'बस, थैंक गॉड' अब आगे बढ़ो। तुम्हें पसंद है, मुझे फर्क नहीं पड़ता।' आज जब मैं उसे देखता हूं तो वही उत्साह दिखाई देता है, लेकिन उसके साथ एक परिपक्वता भी आ गई है। वह आज एक बहुत अनुभवी अभिनेता हैं। कई बार बतौर डायरेक्टर मैं किसी सीन को एक खास स्तर पर करना चाहता हूं, लेकिन जेनेलिया डायलॉग के बीच में कुछ ऐसा कर देती हैं जिसकी मैंने उम्मीद नहीं की होती। तब मुझे लगता है कि 'Wow, यह तो कमाल हो गया।' एक डायरेक्टर के तौर पर मैं जेनेलिया से बहुत इंस्पायर होता हूं। अगर किसी डायरेक्टर को जेनेलिया जैसी एक्टर मिल जाए तो वह सच में बहुत लकी है। 

सवाल: रितेश और जेनेलिया, 'राजा शिवाजी' के बाद आप दोनों के अगले प्रोजेक्ट्स क्या हैं? 

रितेश देशमुख: फिलहाल प्रोडक्शन के स्तर पर हम कुछ चीजों पर काम कर रहे हैं। अभी उन्हें स्ट्रीमलाइन किया जा रहा है। देखते हैं आगे चीजें किस तरह जाती हैं। फिलहाल इतना ही कह सकता हूं।

जेनेलिया डिसूजा: मैं फिलहाल दो फिल्मों में एक्टिंग कर रही हूं। एक फिल्म राम गोपाल वर्मा के साथ है, जिसमें मैं मनोज बाजपेयी के साथ नजर आऊंगी। दूसरी फिल्म इमरान हाशमी के साथ है, जिसका नाम 'Gun Master G9' है। तो फिलहाल ये दो फिल्में हैं।

 


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Content Editor

Manisha

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