Vat Purnima 2026 : वट पूर्णिमा पर बरगद न मिले तो क्या करें, जानिए पूजा को लेकर क्या कहती हैं मान्यताएं

punjabkesari.in Monday, Jun 29, 2026 - 07:49 AM (IST)

Vat Purnima 2026 : हिंदू धर्म में वट पूर्णिमा का व्रत का बहुत खास महत्व है। वट पूर्णिमा का व्रत 29 जून, यानी आज के दिन रखा जाएगा। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए आयु, अच्छी सेहत और सुखी दांपत्य जीवन के लिए बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं और उसके चारों ओर सूत बांधकर परिक्रमा करती हैं। लेकिन कई बार बड़े शहरों में रहने के कारण या किसी अन्य वजह से महिलाओं को पूजा के लिए आसपास बरगद का पेड़ नहीं मिल पाता। ऐसे में मन में यह सवाल उठना है कि बिना बरगद के पेड़ की पूजा पूरी होगी। तो आइए जानते हैं बरगद के पेड़ न मिले पूजा के लिए तो ऐसे समय में आपको क्या करना चाहिए।

Vat Purnima 2026

गमले में बरगद की टहनी लाकर पूजा करें
यदि बाहर कहीं बड़ा पेड़ नहीं मिल रहा है, तो आप पूजा से एक दिन पहले या सुबह किसी बगीचे या नर्सरी से बरगद के पेड़ की एक छोटी सी टहनी ले आएं। इसे घर के साफ गमले या मिट्टी के कलश में स्थापित करें। इसके बाद पूरे विधि-विधान से रोली, अक्षत, धूप-दीप और सूत लपेटकर इसकी पूजा करें। पूजा संपन्न होने के बाद अगले दिन इस टहनी को किसी साफ स्थान पर विसर्जित कर दें या मिट्टी में दबा दें।

मानसिक रूप से या तस्वीर की पूजा करें
अगर टहनी लाना भी संभव न हो, तो आप अपने घर के मंदिर में वट वृक्ष की एक साफ तस्वीर या दीवार पर रोली-चंदन से बरगद के पेड़ की आकृति बना सकती हैं। माता सावित्री और सत्यवान का ध्यान करते हुए इस आकृति या तस्वीर पर जल, फूल और कलावा अर्पित करें। ईश्वर भाव के भूखे होते हैं, इसलिए सच्ची श्रद्धा से की गई मानसिक पूजा भी उतनी ही फलदायी होती है।

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तुलसी या पीपल के पेड़ के पास पूजा
यदि बरगद बिल्कुल सुलभ न हो, तो घर में मौजूद पूजनीय तुलसी के पौधे या पास के किसी मंदिर में जाकर पीपल के वृक्ष के नीचे माता सावित्री और सत्यवान की कथा पढ़ सकती हैं। हालांकि, ध्यान रहे कि मन में संकल्प वट पूर्णिमा का ही होना चाहिए।

क्यों किया जाता है बरगद के पेड़ का ही पूजन? जानिए मान्यताएं
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बरगद के पेड़ में त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना जाता है। इसकी शाखाओं में सावित्री देवी निवास करती हैं। बरगद के पेड़ की आयु सैकड़ों वर्ष होती है, इसे अक्षय वट भी कहा जाता है। सुहागिनें इस पेड़ की लंबी आयु की तरह ही अपने सुहाग की लंबी उम्र की कामना के लिए इसकी पूजा करती हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, जब यमराज सत्यवान के प्राण हरकर ले जा रहे थे, तब सावित्री ने इसी वट वृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या की थी और अपने तपोबल से यमराज को विवश करके अपने पति के प्राण वापस ले आई थीं। तभी से इस पेड़ को पूजने की परंपरा चली आ रही है।

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Content Editor

Sarita Thapa

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