Story of Kakbhushundi in Ramayan: कौआ के रुप में सुनाते थे राम कथा, रामायण से जुड़ी है ये रहस्यमयी कहानी
punjabkesari.in Thursday, Jan 08, 2026 - 01:39 PM (IST)
Story of Kakbhushundi: हिंदू धर्मग्रंथों और पुराणों में कई ऐसे पात्रों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें अपने कर्मों या श्राप के कारण असामान्य जीवन जीना पड़ा। ऐसा ही एक रहस्यमय और अत्यंत ज्ञानी पात्र हैं काकभुशुण्डी, जिनका उल्लेख रामचरितमानस के उत्तरकांड में मिलता है। वे एक महान रामभक्त थे, लेकिन ऋषि के श्राप के कारण उन्हें जीवनभर कौए के रूप में रहना पड़ा। इसके बावजूद, काकभुशुण्डी को अमरता, दिव्य ज्ञान और श्रीराम की कथा सुनाने का विशेष वरदान प्राप्त हुआ।

कौन थे काकभुशुण्डी? (Who Was Kakbhushundi)
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव ने माता पार्वती को श्रीराम की कथा सुनाई थी। उसी समय एक कौए ने यह कथा सुन ली थी। मान्यता है कि उसी कौए का पुनर्जन्म काकभुशुण्डी के रूप में हुआ। काकभुशुण्डी को भगवान शिव के मुख से सुनी गई रामकथा पूरी तरह स्मरण थी। यही कारण था कि उन्होंने आगे चलकर यह दिव्य कथा कई महान भक्तों और देवताओं को सुनाई। भगवान शिव द्वारा कही गई यह कथा अध्यात्म रामायण के नाम से प्रसिद्ध हुई।
काकभुशुण्डी और नागपाश से श्रीराम की मुक्ति (Kakbhushundi and Ramayan)
रामचरितमानस के अनुसार, लंका युद्ध के दौरान जब मेघनाद ने श्रीराम और लक्ष्मण को नागपाश में बांध दिया था, तब नारद मुनि के कहने पर गरुड़ जी ने आकर दोनों भाइयों को मुक्त कराया लेकिन श्रीराम को इस अवस्था में देखकर गरुड़ जी के मन में उनके अवतार को लेकर संदेह उत्पन्न हो गया।
गरुड़ जी का संदेह कैसे दूर हुआ? (Kakbhushundi Clears Garuda’s Doubt)
गरुड़ जी के संदेह को दूर करने के लिए नारद मुनि ने उन्हें पहले ब्रह्मा जी के पास भेजा। ब्रह्मा जी ने महादेव के पास भेजा। महादेव ने गरुड़ जी को काकभुशुण्डी के पास भेजा। इसके बाद काकभुशुण्डी ने श्रीराम के दिव्य चरित्र और लीला का विस्तार से वर्णन किया, जिससे गरुड़ जी का संदेह पूरी तरह समाप्त हो गया।
काकभुशुण्डी कौआ कैसे बने? (Why Did Kakbhushundi Become a Crow)
काकभुशुण्डी ने स्वयं गरुड़ जी को अपने कौआ बनने की कथा सुनाई।

प्रथम जन्म की कथा
काकभुशुण्डी का पहला जन्म अयोध्या में एक शूद्र परिवार में हुआ। वे भगवान शिव के भक्त थे लेकिन अहंकार के कारण अन्य देवताओं की निंदा करते थे। अकाल पड़ने पर वे उज्जैन चले गए, जहां एक दयालु ब्राह्मण की सेवा करने लगे। वह ब्राह्मण भी शिवभक्त था, लेकिन किसी देवता की निंदा नहीं करता था।
गुरु अपमान और भगवान शिव का श्राप (Kakbhushundi Curse by Lord Shiva)
एक बार अहंकार में आकर काकभुशुण्डी ने अपने गुरु का अपमान कर दिया। इससे भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्हें श्राप दिया, “तू सर्प योनि में जन्म लेगा और हजारों योनियों में भटकेगा।”
हालांकि गुरु के निवेदन पर भगवान शिव ने यह भी कहा कि प्रायश्चित के बाद उन्हें मुक्ति का मार्ग मिलेगा।
लोमश ऋषि का श्राप और कौए की योनि (Lomesh Rishi Curse Story)
कई जन्मों के बाद काकभुशुण्डी को ब्राह्मण शरीर प्राप्त हुआ। ज्ञान प्राप्ति के लिए वे लोमश ऋषि के पास गए। लेकिन वहां वे बार-बार तर्क-वितर्क करने लगे। इससे क्रोधित होकर लोमश ऋषि ने उन्हें श्राप दिया, “तू चांडाल पक्षी यानी कौआ बन जा।”
वे तुरंत कौए में परिवर्तित हो गए।
राममंत्र और इच्छामृत्यु का वरदान (Blessing of Immortality)
बाद में लोमश ऋषि को अपने श्राप पर पश्चाताप हुआ। उन्होंने काकभुशुण्डी को राममंत्र और इच्छामृत्यु का वरदान दिया। राममंत्र के प्रभाव से काकभुशुण्डी को अपने कौए के शरीर से भी प्रेम हो गया और वे आजीवन श्रीराम की कथा सुनाने वाले अमर भक्त बन गए।
काकभुशुण्डी का महत्व (Importance of Kakbhushundi)
वे अमर रामभक्त थे। त्रिकालदर्शी और परमज्ञानी माने जाते हैं। रामचरितमानस में उन्हें विशेष स्थान प्राप्त है।
काकभुशुण्डी की कथा हमें सिखाती है कि अहंकार पतन का कारण बनता है, लेकिन रामभक्ति और गुरु कृपा से सबसे बड़ा श्राप भी वरदान बन सकता है।

