कौन है देवी चंद्रघंटा, किसका वध करने के लिए लिया इन्होंने ये अवतार?

2020-03-26T12:28:23.96

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
27 मार्च को चैत्र नवरात्रि का तीसरा दिन है। इस दिन माता के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की आराधना की जाती है। मां दुर्गा का ये लोकप्रिय अवतार है जिसकी पूजा वैष्णो देवी में की जाती है शास्त्रों के अनुसार मां चंद्रघंटा को हिंदू धर्म में अधिक महत्व प्राप्त है। इनकी साधना से जहां एक तरफ़ मन को असीम शांति प्राप्त होती है तो वहीं दूसरी ओर इस खास अवसर पर इनकी साधना से जातक का मन मणिपूर चक्र में प्रविष्ट होता है। ज्योतिषियों का मानना है कि मां चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है। तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियां सुनाई देती हैं। ये क्षण साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने के होते हैं। अब आप इतना तो जान ही चुके हैं कि आज मैं आपसे माता चंद्रघंटा के बारे में ही बात करने वाले हूं, तो चलिए फिर देर किस बात की बताते हैं आपके माता चंद्रघंटा के बारे में। जो अपने भक्तों को देती हैं वरदान।

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शास्त्रों के अनुसार मां चंद्रघंटा की आराधना से साधक में वीरता और निर्भयता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है। ये देवी कल्याणकारी है। मां चंद्रघंटा व्यक्ति के मन पर स्वामित्व रखती हैं। अगर मां चंद्रघंटा के रूप की बात की जाए तो मां के इस रूप के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है। इसीलिए इस देवी को चंद्रघंटा कहा गया है। इनके शरीर का रंग सोने के समान बहुत चमकीला है। अपने इस रूप से माता देवगण, संतों और भक्त जन के मन को संतोष प्रदान करती हैं। मां चन्द्रघंटा अपने प्रिय वाहन सिंह पर बैठकर होकर अपने दस हाथों में खड्ग, तलवार, ढाल, गदा, पाश, त्रिशूल, चक्र,धनुष, भरे हुए तरकश लिए मंद मंद मुस्कुरा रही होती हैं। मां चंद्रघंटा की पूजा करने से जातक के सभी पाप नष्टल हो जाते हैं और जन्म -जन्मी का डर खत्म हो जाता है और जातक निर्भय बन जाता है।

धार्मिक ग्रंथों में इनसे जुड़ी पौराणिक कथा की बात करें तो प्राचीन समय में देवताओं और असुरों के बीच लंबे समय तक युद्ध चला। असुरों का स्वामी महिषासुर था और देवताओं के स्वामी इंद्र थे। महिषासुर ने देवाताओं पर विजय प्राप्ता कर इंद्र का सिंहासन हासिल कर लिया और स्वओर्गलोक पर राज करने लगा। इसे देखकर सभी देवतागण परेशान हो गए और इस समस्या से निकलने का उपाय जानने के लिए त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास गए। देवताओं ने बताया कि महिषासुर ने इंद्र, चंद्र, सूर्य, वायु और अन्यत देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए हैं और उन्हें बंधक बनाकर स्वर्गलोक का राजा बन गया है।  देवाताओं ने बताया कि महिषासुर के अत्याचार के कारण अब देवता पृथ्वी पर विचरण कर रहे हैं और स्वर्ग में उनके लिए कोई जगह नहीं है। ये सुनकर ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शंकर को बहुत गुस्सा आया। तीनों देवता के गुस्से की कोई सीमा नहीं थी। गुस्से की वजह से तीनों के मुख से ऊर्जा उत्पन्न हुई। और देवगणों के शरीर से निकली ऊर्जा भी उस ऊर्जा से जाकर मिल गई। ये दसों दिशाओं में व्या्प्त. होने लगी। तभी वहां एक देवी का अवतरण हुआ। भगवान शंकर ने देवी को त्रिशूल और भगवान विष्णु ने चक्र प्रदान किया। इसी प्रकार अन्य देवी देवताओं ने भी माता के हाथों में अस्त्र शस्त्र सजा दिए। इंद्र ने भी अपना वज्र और ऐरावत हाथी से उतरकर एक घंटा दिया। सूर्य ने अपना तेज और तलवार दिया और सवारी के लिए शेर दिया। तभी उनका नाम चंद्रघंटा पड़ा।
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अब देवी महिषासुर से युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार थीं। उनका विशालकाय रूप देखकर महिषासुर ये समझ गया कि अब उसका काल आ गया है। महिषासुर ने अपनी सेना को देवी पर हमला करने को कहा, अन्य दैत्य और दानवों के दल भी युद्ध में कूद पड़े। लेकिन देवी ने एक ही झटके में दानवों का संहार कर दिया। इस युद्ध में महिषासुर तो मारा ही गया, साथ में अन्य। बड़े दानवों और राक्षसों का भी संहार मां के हाथों कर दिया। इस तरह मां ने सभी देवताओं को असुरों से मुक्ति दिलाई।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चलिए देवी चंद्रघंटा की साधना करते हुए खास ध्यान रखना चाहिए-

सबसे पहले नहा धोकर घी का दीपक जलाएं और फिर कलश में गंगा जल मिला लें, साथ ही कलश में दूर्वा, सुपारी, सिक्का केसर चावल बेलपत्र डालें।

मां को पीले फूल चढ़ाएं। दूध, दही, शहद, गुड़ घी का पंचामृत चढ़ाएं। लाल अनार, गुड़ या गुलाब जामुन का भोग लगाएं।

साथ ही 21 रूपए की दक्षिणा चढ़ाएं। मां के इस रूप की पूजा करने से नौकरी, बिजनेस में आ रही परेशानी दूर होगी।

साथ ही घर के सभी कलेश भी खत्म हो जाएंगे और आप एक बेहतर ज़िंदगी जी पाएंगे। इसके अलावा देवी चंद्रघंटा के निम्न अचूक मंत्र का जप करें।

मंत्र -
दारिद्रय दुःख: भय हरिणी का त्वदन्या ।
सर्वोपकार करणाय सदार्दचिता।।
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Jyoti

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