Shiv Ji Aur Kamdev Ki Katha: भगवान शिव ने कामदेव को क्यों कर दिया था भस्म? जानिए तीसरी आंख से जुड़ी पौराणिक कथा
punjabkesari.in Tuesday, Jan 13, 2026 - 11:44 AM (IST)
Shiv Ji Aur Kamdev Ki Katha: हिंदू धर्म में भगवान शिव को संहार और करुणा दोनों का प्रतीक माना जाता है। वे जितने भोले और दयालु हैं, उतने ही प्रचंड भी। शिव पुराण और अन्य ग्रंथों में वर्णित कामदेव और भगवान शिव की कथा उनके तीसरे नेत्र की महिमा को दर्शाती है। यह कथा केवल क्रोध की नहीं, बल्कि धर्म, तपस्या और ब्रह्मांडीय संतुलन की भी है।

माता सती का आत्मदाह और शिव का तांडव
शिव पुराण के अनुसार, एक बार राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, लेकिन उसमें अपने दामाद भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। माता सती अपने पिता के यज्ञ में पहुंचीं, जहां भगवान शिव का अपमान किया गया। यह अपमान सहन न कर पाने के कारण माता सती ने यज्ञ की अग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया।
इस घटना से भगवान शिव अत्यंत क्रोधित और दुखी हो गए। उन्होंने विकराल तांडव आरंभ कर दिया, जिससे सृष्टि के विनाश का भय उत्पन्न हो गया। देवताओं के अनुरोध पर शिव शांत हुए और अंततः समाधि में लीन हो गए।
तारकासुर का आतंक और देवताओं की चिंता
उसी समय दैत्य तारकासुर ने घोर तपस्या कर ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त कर लिया कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही संभव होगा। शिव समाधि में थे और माता सती देह त्याग चुकी थीं, ऐसे में देवताओं के सामने संकट खड़ा हो गया।
तारकासुर तीनों लोकों में आतंक फैलाने लगा। देवताओं ने समझ लिया कि शिव को समाधि से बाहर लाना अनिवार्य है, ताकि उनके पुत्र का जन्म हो सके।

कामदेव को सौंपी गई कठिन जिम्मेदारी
लंबे विचार के बाद देवताओं ने कामदेव को यह जिम्मेदारी सौंपी कि वे भगवान शिव की समाधि भंग करें। कामदेव प्रेम और आकर्षण के देवता थे, लेकिन यह कार्य अत्यंत जोखिम भरा था।
कामदेव ने वसंत ऋतु का सहारा लिया, वातावरण को मोहक बनाया, लेकिन शिव समाधि में अडिग रहे। अंततः कामदेव ने अपना पुष्प बाण शिव के हृदय की ओर चला दिया।

तीसरी आंख खुली और कामदेव हुए भस्म
जैसे ही पुष्प बाण शिव जी को लगा, उनकी समाधि भंग हो गई। क्रोध में शिव ने अपनी तीसरी आंख खोल दी। उस नेत्र से निकली अग्नि ने कामदेव को तत्काल भस्म कर दिया।
यही कारण है कि कामदेव को अनंग (बिना शरीर वाला) कहा जाता है। बाद में रति के विलाप और देवताओं की प्रार्थना से शिव जी ने कामदेव को अदृश्य रूप में पुनर्जीवन दिया।
कथा से मिलने वाली शिक्षा
यह पौराणिक कथा सिखाती है कि तपस्या और ब्रह्मचर्य सर्वोपरि हैं। अहंकार और असंयम विनाश का कारण बनते हैं। शिव का तीसरा नेत्र केवल क्रोध नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा का प्रतीक है।
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