Sheetala Ashtami Vrat Katha : कालाष्टमी पर सुख-समृद्धि के लिए जरूर पढ़े मां शीतला की ये पौराणिक कथा

punjabkesari.in Friday, Apr 10, 2026 - 10:28 AM (IST)

Sheetala Ashtami Vrat Katha : हिंदू धर्म में शीतला अष्टमी, जिसे उत्तर भारत में बासोड़ा भी कहा जाता है, मां शीतला को समर्पित एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और विधि-विधान से शीतला माता की कथा सुनने से घर में बीमारियां प्रवेश नहीं करतीं और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। वास्तु और आयुर्वेद के दृष्टिकोण से भी इस दिन ठंडा भोजन करने का विशेष महत्व है।लेकिन क्या आप जानते हैं कि शीतला अष्टमी का व्रत क्यों रखा जाता है। तो आइए जानते हैं वह पौराणिक कथा, जिसके बिना यह व्रत अधूरा माना जाता है।

Sheetala Ashtami Vrat Katha

शीतला अष्टमी की पौराणिक व्रत कथा
एक खुशहाल गांव में एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार निवास करता था। परिवार में वयोवृद्ध माता-पिता, उनके दो आज्ञाकारी पुत्र और दो बहुएं अपने बच्चों के साथ मिल-जुलकर रहते थे। घर में खुशियों का बसेरा था। जब चैत्र मास की शीतला अष्टमी का पावन पर्व आया, तो घर की मुखिया सास ने दोनों बहुओं को व्रत की गरिमा समझाई। उन्होंने बताया कि मां शीतला को शीतलता प्रिय है, इसलिए आज के दिन घर में चूल्हा नहीं जलेगा और सभी केवल एक दिन पूर्व बना बासी भोजन ही ग्रहण करेंगे।

बहुओं ने सास की आज्ञा तो मान ली, लेकिन ममता के वश में आकर उनके मन में शंका पैदा हो गई। उन्हें डर सताने लगा कि बासी खाना खाने से उनके छोटे बच्चे कहीं बीमार न पड़ जाएं। इसी डर के कारण उन्होंने सास से चोरी-छिपे रसोई में ताज़ा भोजन तैयार किया और बच्चों को खिला दिया। इसके बाद वे निश्चिंत होकर माता के मंदिर में पूजन के लिए निकल गईं। मंदिर से लौटकर जब दोनों बहुएं घर पहुंचीं, तो वहां का दृश्य देखकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उनके चारों बच्चे बेसुध और मृत अवस्था में पड़े थे। मां की ममता चीख उठी और घर में मातम छा गया। जब सास को इस बात का पता चला, तो उन्होंने दुख और क्रोध में कहा, यह माता शीतला के प्रकोप का फल है, क्योंकि तुमने श्रद्धा से ऊपर अपने स्वार्थ को रखा। अब जब तक मां की कृपा से ये बच्चे जीवित नहीं होते, तुम घर की दहलीज पर कदम मत रखना।

Sheetala Ashtami Vrat Katha

दुख की मारी दोनों बहुएं अपने बच्चों के शव लेकर जंगलों की ओर चल दीं। भटकते-भटकते उन्हें रास्ते में दो बहनें मिलीं, जो अपने सिर की खुजली और गंदगी से बहुत व्याकुल थीं। बहुओं ने अपने प्राणों से प्रिय बच्चों के दुख को एक ओर रखकर उन महिलाओं की सेवा करने का निश्चय किया। उन्होंने बड़े धैर्य के साथ उन दोनों बहनों के सिर साफ किए और उन्हें आराम पहुंचाया। बहुओं की निस्वार्थ सेवा से वे दोनों बहनें अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने बहुओं को आशीर्वाद दिया कि तुम्हारी गोद सदा हरी रहे।जैसे ही माता ने यह कहा, मृत पड़े बच्चे खेलखिलाकर उठ बैठे। अपनी गलती का अहसास होने पर बहुओं ने माता के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी। बहुएं खुशी-खुशी बच्चों को लेकर घर लौटीं। उन्होंने सास को पूरी घटना सुनाई और संकल्प लिया कि वे कभी भी नियमों का अनादर नहीं करेंगी। इसके बाद पूरे गांव में माता की महिमा फैल गई और हर घर में सुख-समृद्धि का वास हुआ।

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Content Editor

Sarita Thapa

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