Purushottam Maas katha: भगवान कृष्ण के वरदान से 'मलमास' कैसे बना 'पुरुषोत्तम मास', जानिए कथा

punjabkesari.in Tuesday, May 19, 2026 - 11:38 AM (IST)

Adhik Maas katha 2026: सनातन धर्म में 17 मई से एक अत्यंत पावन काल का आरंभ हो चुका है, जिसे हम 'पुरुषोत्तम मास' के नाम से जानते हैं। 15 जून तक चलने वाला यह महीना भक्ति, तप और दान के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस महीने को कभी 'मलमास' कहकर तिरस्कृत किया जाता था, वह भगवान विष्णु का सबसे प्रिय महीना कैसे बना? आइए जानते हैं इसके पीछे की रोचक पौराणिक कथा

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Purusottam Maas Katha: प्राचीन काल में जब अधिक मास की उत्पत्ति हुई तब उस माह में सूर्य संक्रांति नहीं थी और न ही उस माह का कोई स्वामी था। इसी कारण उस माह को मंगल कार्य एवं श्राद्ध आदि के लिए निषिद्ध माना जाने लगा। इस व्यवहार से मलमास बहुत व्यथित हुआ और अपना धीरज खोने लगा। वह दुखी होकर बैकुंठ पहुंचा और भगवान विष्णु के समक्ष दुखी होकर कहने लगा। तभी विष्णु ने पूछा, ‘‘तुम कौन हो? वैकुंठ में दुख, शोक, मृत्यु आदि का प्रवेश निषेध है? ऐसे धाम में आकर भी तुम क्यों शोकग्रस्त हो?’’

भगवान की प्रेम भरी वाणी सुनकर मलमास बोला, ‘‘मैं मलमास हूं। विश्व में क्षण, लव, मुहूर्त, पक्ष, मास, दिन-रात सभी अपने-अपने अधिपतियों के संरक्षण में रहकर आनंद मनाते हैं। एक मैं ही अभागा हूं जिसका कोई अधिपति नहीं है। संसार के लोग मुझे निंदनीय समझकर मेरा तिरस्कार कर रहे हैं। मैं आपकी शरण में आया हूं। मुझ पर कृपा करें।’’

मलमास की ऐसी दशा देख कर भगवान थोड़े समय के लिए चिंतित हो गए। कुछ समय पश्चात वे बोले, ‘‘तुम मेरे साथ भगवान श्री कृष्ण के धाम चलो, वे अवश्य ही तुम्हारे दुख का निवारण करेंगे।’’ ऐसा कह कर मलमास को लेकर गोलोक की ओर चल पड़े।

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श्री कृष्ण के प्रताप से वहां शोक, भय, दुख, बुढ़ापा, मृत्यु या रोग का नाम नहीं था। श्री कृष्ण पीताम्बर पहने हुए वहां विराजमान थे। वहां पहुंच कर विष्णु और मलमास भगवान श्री कृष्ण के श्री चरणों में नत हो गए। श्री कृष्ण ने श्री विष्णु से आने का कारण पूछा।

तब विष्णु ने बताया, ‘‘यह मास अर्क संक्रमण से रहित होने के कारण मलिन हो चुका है। वेदविहित कर्मों के अयोग्य होने के कारण सब इसकी निंदा और अपमान कर रहे हैं। इसका कोई स्वामी नहीं है, इसी कारण यह बहुत व्यथित है। हे कृष्ण! आपके अतिरिक्त कोई इसके दुख का निवारण नहीं कर सकता।’’

भगवान श्री कृष्ण ने कहा, ‘‘आपने इसे यहां लाकर ठीक ही किया, इसके कष्ट निवारणार्थ मैं इसे अपने तुल्य करता हूं। मुझमें जितने भी गुण हैं उन सबको मैं मलमास को सौंप रहा हूं, मेरा जो नाम वेद, लोक और शास्त्र में विख्यात है, आज से उसी पुरुषोत्तम नाम से यह मलमास विख्यात होगा और मैं स्वयं इस मास का स्वामी हो गया हूं। जिस परमधाम में पहुंचने के लिए मुनि महर्षि तप में रत रहते हैं, वही पद पुरुषोत्तम मास में स्नान, पूजादि, अनुष्ठान करने वाले को सुगमता से प्राप्त हो जाएगा।’’

इस प्रकार प्रति तीसरे वर्ष पुरुषोत्तम मास के आने पर जो संसारी उपवास, पूजा, भक्ति आदि करते हैं वे परमधाम गोलोक को प्राप्त करके परम सुख का भोग करते हैं। 

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Content Writer

Niyati Bhandari

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