शिव जी पर क्यों चढ़ाई जाती हैं ये चीज़ें, जानें धार्मिक और वैज्ञानिक कारण

2021-07-31T10:52:07.203

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
सनातन धर्म के अनुसार भगवान शंकर की आराधना करना सबसे आसान माना गया है क्योंकि भोलेनाथ एकमात्र ऐसे देवता है जो अपने भक्तों की बहुत ही सरल पूजा से भी प्रसन्न हो जाते हैं। बल्कि कहा जाता है कि केवल श्रद्धा पूर्वक इन्हें दूध या गंगाजल भी अर्पित किया जाए तो यह उससे भी प्रसन्न होकर अपने भक्तों की मनोकामना को पूरा करते हैं। यही कारण है कि भगवान शंकर के भक्त इन्हें प्रसन्न करने के लिए दूध, दही व गंगाजल आदि से इनका जल अभिषेक करते हैं। खास तौर पर सावन मास में देशभर के लगभग हर शिवालय में श्रद्धालु शिव शंभू के लिंग रूप यानी शिवलिंग पर दूध, दही आदि अर्पित करते देखे जाते हैं। परंतु क्या कभी किसी ने इस बारे में जानने की कोशिश की है कि आखिर भगवान शंकर के निराकार स्वरूप शिवलिंग पर यह तमाम चीजें क्यों चढ़ाई जाती हैं? यदि नहीं तो आइए आज आपको हम ऐसा करने की कारण बताते हैं-

धार्मिक कारण
धार्मिक शास्त्र में वर्णन के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान देवताओं और असुरों द्वारा किए गए मंथन से सबसे पहले विष निकला था। जो अधिक विषैला था, संपूर्ण संसार का इससे नाश हो सकता था। ऐसे में संसार को बचाने के लिए भगवान शंकर ने इस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया था। परंतु इस विष का तीखापन और ताप इतना ज्यादा था कि भगवान शंकर का कंठ नीला हो गया और उनका शरीर ताप से जलने लगा।

विष इतना जहरीला था कि इसका प्रभाव भगवान शंकर की जटा में विराजमान मां गंगा पर भी पड़ने लगा। यहां तक कि उन्हें शांत करने के लिए जल की शीतलता भी कम पड़ गई। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उस वक्त समस्त देवताओं ने भगवान शंकर का जलाभिषेक करने के बाद उन्हें दूध ग्रहण करने का आग्रह किया ताकि विष का प्रभाव कम हो सके। सभी के आश्रय करने पर भगवान शंकर ने दूध ग्रहण किया तथा देवताओं ने मिलकर बाद में उनका दूध से अभिषेक किया।

ऐसी मान्यता है प्रचलित है कि इसके बाद से ही शिवलिंग पर दूध चढ़ाने की परंपरा प्रचलन में आई। कहा जाता है कि श्रावण मास में भोलेनाथ को जो व्यक्ति श्रद्धा पूर्वक दूध अर्पित करता है उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं क्योंकि श्रावण मास के साथ-साथ भगवान शंकर को दूध अति प्रिय है।


वैज्ञानिक कारण-
वैज्ञानिकों का मानना है कि शिवलिंग एक विशेष प्रकार का पत्थर होता है जिसे क्षरण से बचाने हेतु इस पर दूध, घी, शहद आदि जैसे चिकनी और ठंडे पदार्थ अर्पित किए जाते हैं।


अगर इस पर किसी प्रकार की तैलीय सामग्री अर्पित नहीं की जाती तो समय के साथ में भंगूर होकर टूट सकता है। परंतु यदि हमेशा इसे गिला रखा जाए तो यह हजारों वर्ष तक ऐसे ही बना रहता है। इसके अलावा वैज्ञानिक कहते हैं कि शिवलिंग का पत्थर उपरोक्त पदार्थों को एब्जॉब कर लेता है जो इस प्रकार से उसका भोजन ही होता है।


शिवलिंग पर उचित मात्रा में भी और खास समय पर ही दूध, घी, शहद, दही आदि अर्पित किया जाते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार शिवलिंग को हाथों से अधिक रगड़ना नहीं चाहिए ऐसे में शिवलिंग का क्षरण हो सकता है। इसलिए खास तौर पर सोमवार और सावन माह में ही इनकी अभिषेक करने की परंपरा प्रचलित है


 


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Content Writer

Jyoti

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