जानिए ‘रुद्राक्ष’ के धार्मिक एवं औषधीय लाभ

punjabkesari.in Saturday, May 14, 2022 - 04:35 PM (IST)

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रुद्राक्ष दो शब्दों ‘रूद्र्र तथा ‘अक्ष’ से बना है तथा भगवान शंकर की आंख से गिरी जलङ्क्षबदु से रुद्राक्ष की उत्पत्ति हुई है। शिव पुराण के अनुसार संसार की कल्याण कामना के लिए भगवान शिव ने हजारों वर्ष तपस्या की। उस समय उन्हें भय-सा लगा और उन्होंने अनायास ही नेत्र खोले। तभी एक बूंद अश्रु की गिरी और इसी बीज रूपी अश्रु से रुद्राक्ष का पेड़ लगा।

लोक कल्याण की भावना से भगवान शंकर के अंश से उत्पन्न यह परम श्रेष्ठ फल उनको बहुत प्रिय है, अत: रुद्राक्ष की माला भगवान शंकर की पूजा में अनिवार्य मानी जाती है।
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मान्यता है कि रुद्राक्ष धारण करने से मुक्ति, कल्याण एवं सर्वांगीण सुख-शांति मिलती है। रुद्राक्ष उत्तर-पूर्वी भारत एवं पश्चिमी घाट में मिलने वाला मध्यम आकार का वृक्ष है जो नेपाल, बिहार, बंगाल, असम, मध्यप्रदेश व मुम्बई में पाया जाता है। शेष भारत में यह कहीं-कहीं पाया जाता है तथा भारत मे कई भागों में इसे छाया एवं शोभाकारी वृक्ष के रूप में उगाया जाता है। इसकी पत्तियां आयाताकार-भालाकार होती है। इसके श्वेत पुष्प मई-जून में मिलते हैं तथा फल नवम्बर से दिसम्बर तक पकते हैं।

इसका फल हल्का नीलापन लिए बैंगनी रंग का अष्ठीफल होता है जिसमें खाने योग्य गूदा व एक गुठली होती है जो कड़ी, गोल या अंडाकार होती है। यह प्राय: पंचकोष्ठीय होती है परन्तु कभी-कभी प्रकृति में एक से सात कोष्ठीय गुठलियां भी मिलती हैं जिसके अनुसार रुद्राक्ष एकमुखी, द्विमुखी, त्रिमुखी आदि कहलाते हैं। पांच से अधिक या कम कक्षों वाले रुद्राक्ष महंगे बिकते हैं।
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नेपाल के जंगलों में पंचमुखी रुद्राक्ष (छोटे आंवले के आकार के) बहुतायत में पाए जाते हैं। इसे विभिन्न प्रदेशों में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है, इसको बंगाली में रुद्राख्या, उडि़सी में ल्द्राखो, असमी में रुद्रई, तोहलंगसेवेई, लद्रोक, उद्रोक आदि नामों से तथा मराठी, तेलगू, तमिल, कन्नड़ मलयालम व संस्कृत भाषा में रुद्राक्ष के नाम से जाना  या पुकारा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम ‘इलियोकार्यस स्फेरीकस’ है।

उपयोग : रुद्राक्ष को मुक्ति व युक्ति देने वाला बताया गया है। इसे हृदय  रोग एवं उच्च तथा निम्र रक्तचाप में उपयोगी माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि रुद्राक्ष की मालाओं को धारण करने से उच्च रक्तचाप कम हो जाता है तथा हृदय रोगों में लाभ होता है।
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इसका गूदा खट्टा होता है व मिर्गी के दौरों में अच्छा समझा जाता है। शास्त्रों में इसकी माला धारण करने से व्यक्तित्व के विकास व मानसिक शांति प्राप्त होने का वर्णन किया गया है। —डा. नवीन कुमार बोहरा  


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Content Writer

Jyoti

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