Religious Katha: माता सीता की अद्वितीय साड़ी, 14 साल वनवास के दौरान नहीं आई एक भी खरोंच
punjabkesari.in Wednesday, Feb 26, 2025 - 01:09 PM (IST)
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Religious Katha: रामायण की कथा में माता सीता का वनवास एक महत्वपूर्ण प्रसंग है। यह न केवल उनकी वीरता और धैर्य का प्रतीक है बल्कि उनकी आंतरिक शक्ति और दिव्यता को भी उजागर करता है। जब माता सीता को अपने पति श्रीराम के साथ 14 वर्षों का वनवास भोगने के लिए भेजा गया, तो उनका पहनावा एक महत्वपूर्ण सवाल बन गया। वन में कठिन परिस्थितियों में रहते हुए, माता सीता की साड़ी में एक भी खरोंच नहीं आई, न ही उसमें किसी प्रकार की गंदगी या क्षति आई। यह एक ऐसा रहस्य है, जो हर किसी के मन में बहुत से सवाल पैदा करता है। इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि किस प्रकार माता सीता की साड़ी 14 वर्षों तक अपनी चमक और पवित्रता को बनाए रखने में सक्षम रही और इसके पीछे क्या रहस्य हो सकता है।
साड़ी की प्राप्ति
जब श्री राम, लक्ष्मण और माता सीता वनवास के लिए जा रहे थे तो उन्होंने कुछ समय ऋषि अत्रि के आश्रम में व्यतीत किया था। जब ऋषि की पत्नी माता अनसुइया को पता लगा कि वे 14 वर्षों के लिए वनवास जा रहे हैं तो उन्हें सीता माता को एक साड़ी भेंट की। आम से दिखने वाली इस साड़ी की एक खासियत थी की एव कभी मैली नहीं होती थी और न ही कभी फटती थी। यह साड़ी अग्नि देव के तपोबल से प्रसन्न होकर माता अनसुइया को मिली थी। मान्यताओं के अनुसार यह सुनने में आता है कि पूरे 14 सालों के दौरान ये साड़ी एक दम नई बनी रहती थी।
साड़ी का रंग
माता अनसुइया द्वारा दी गई साड़ी का रंग पीला था, जो हिंदू धर्म में शुभता का प्रतीक माना जाता है। पीला रंग ज्ञान, विद्या और पवित्रता का प्रतीक है। इस रंग को तात्त्विक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह सकारात्मक ऊर्जा, शांति और जीवन में संतुलन का संकेत है। पीले रंग का विशेष प्रभाव यह था कि वह एक ओर जहां माता सीता के सरल और सौम्य व्यक्तित्व को उजागर करता था, वहीं दूसरी ओर यह उनके जीवन में शांति और समृद्धि को भी दर्शाता था। साड़ी का पीला रंग न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण था, बल्कि यह उसे एक विशिष्ट दिव्यता और शक्ति प्रदान करता था, जो सीता माता के वनवास के कठिन समय में उनके साथ था।
साड़ी का महत्व
माता सीता द्वारा 14 वर्षों तक एक ही साड़ी पहनना उनके पतिव्रत धर्म और समर्पण का प्रतीक था। वनवास के कष्टों और कठिनाइयों के बावजूद, माता सीता ने इस साड़ी को धारण किया और अपने पतिव्रत धर्म को निभाया। यह दिखाता है कि वह अपने पति श्रीराम के प्रति कितनी श्रद्धा और प्रेम रखती थीं। उनके लिए श्रीराम का साथ और उनका समर्पण सबसे महत्वपूर्ण था और यही कारण था कि उन्होंने वनवास के दौरान इस साड़ी को चुना, जो न केवल उनके साथ थी, बल्कि उनके धर्म और आस्था का भी प्रतीक बन गई। माता सीता का यह त्याग और समर्पण केवल उनके व्यक्तिगत जीवन का ही हिस्सा नहीं था बल्कि यह समाज को यह संदेश देता है कि असल शांति और सुख केवल त्याग और समर्पण से मिल सकते हैं। वह भगवान श्रीराम के प्रति अपने प्रेम और श्रद्धा को अपने जीवन के हर पहलू में प्रकट करती थीं और यह साड़ी उसी समर्पण का प्रतीक थी।