Ramadan 2021: जानें, कब शुरु होगा नेकियों और इबादतों का महीना ‘रमजान’

2021-04-12T15:37:50.32

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Ramadan 2021: रमजान का पवित्र महीना इस्लामिक कैलेंडर का नौवां महीना होता है। इस महीने में मुस्लिम भाईचारे के सदस्य रोजे रखते हैं और अल्लाह की इबादत की जाती है। इस महीने की शुरूआत चांद देखने के बाद होती है। इस वर्ष अगर चांद 12 अप्रैल को दिखाई देगा तो पहला रोजा 13 अप्रैल को रखा जाएगा और यदि 13 अप्रैल को चांद दिखाई देगा तो 14 अप्रैल से रोजे शुरू होंगे।

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बरकतों का महीना
रमजान का महीना 29 या 30 दिनों का होता है। इस महीने को बरकतों का महीना कहा जाता है। इस महीने मुस्लिम भाईचारे के लोग सुबह सूरज निकलने से लगभग दो घंटे पहलेे उठकर सहरी करते हैं और शाम को सूरज डूबने के बाद इफ्तार करके रोजा खोलते हैं।

रमजान के महीने में सूर्योदय से पहले खाए गए खाने को सहरी कहते हैं वहीं सूर्यास्त के बाद शाम में जब रोजा खोला जाता है तो उसे इफ्तार कहा जाता है।

सहरी खाने के बाद मुस्लिम भाई-बहन पूरे दिन भूखे-प्यासे रहकर रोजा रखते हैं और साथ में महीने भर इबादत करते हैं तथा अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं। इसी लिए इस मास को नेकियों और इबादतों का महीना माना जाता है। इस महीने रात में तरावीह की नमाज पढ़ी जाती है।

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रूह पवित्र करने का वक्त
इस महीने हर आदमी अपनी रूह को पवित्र करने के साथ अपनी दुनियादारी की हर गतिविधि को पूरी तत्परता के साथ वश में रखते हुए केवल अल्लाह की इबादत में समर्पित हो जाता है। जिस खुदा ने आदमी को पैदा किया है उसके लिए सब प्रकार का त्याग मजबूरी नहीं फर्ज बन जाता है, इसीलिए तकवा लाने के लिए पूरे रमजान के महीने रोजे रखे जाते हैं।

गलतियों को सुधारने का वक्त
रमजान के बारे में गहराइयों से जानकारी देते हुए अखिल भारतीय इमाम संगठन के अध्यक्ष इमाम उमेर अहमद इलियासी का कहना है कि रमजान के महीने में की गई खुदा की इबादत बहुत असरदार होती है। इसमें खान-पान सहित दुनियादारी की अन्य आदतों पर संयम कर, जिसे अरबी में ‘सौम’ कहा जाता है, आदमी अपने शरीर को वश में रखता है, साथ ही तरावीह और नमाज पढऩे से बार-बार अल्लाह का जिक्र होता रहता है, जिसके द्वारा इंसान की आत्मा (रूह) पाक-साफ होती है।

उन्होंने बताया कि इंसान गलतियों का पुतला भी होता है। अत: अपनी गलतियों को सुधारने का मौका भी रमजान के रोजे में मिलता है।

गलतियों के लिए तौबा करने एवं अच्छाइयों के बदले बरकत पाने के लिए भी इस महीने की इबादत का महत्व है। इसीलिए इन दिनों जकात देने का भी अत्यधिक महत्व है।

जकात का महत्व
जकात का मतलब है अपनी कमाई का अढ़ाई प्रतिशत गरीबों में बांटना। वस्तुत: जकात देने से आदमी के माल एवं कारोबार में खुदा बरकत करता है। इस्लाम में रोजे, जकात और हज ये तीनों फर्ज हैं, मजबूरी नहीं।

हर बालिग मर्द और औरत पर रमजान के रोजे फर्ज होते हैं। बिना मजबूरी के कोई रोजा छोड़ नहीं सकता। ईद से पहले फितरा दिया जाता है, जिसमें परिवार का प्रत्येक सदस्य गेहूं या उसकी कीमत के बराबर रकम इकठ्ठा कर उसे जरूरतमंदों में बांटता है।

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Content Writer

Niyati Bhandari

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