Rama Ekadashi Vrat Katha: चातुर्मास की अंतिम ग्यारस पर पाप मुक्ति से लेकर दांपत्य कलह के निवारण तक के लिए पढ़ें, रमा एकादशी की यह फलदायी कथा
punjabkesari.in Tuesday, Nov 03, 2026 - 01:35 AM (IST)
Rama Ekadashi: सनातन धर्म की पावन परंपरा में भगवान श्री हरि विष्णु के निमित्त रखे जाने वाले एकादशी व्रतों का विशेष आध्यात्मिक स्थान है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, एकादशी व्रत का निष्ठापूर्वक पालन करने से साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चारों पुरुषार्थों की सहज प्राप्ति होती है। इसी पावन क्रम में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि (ग्यारस) को 'रमा एकादशी' का पर्व अत्यंत श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया जाता है।
दीपावली पर्व से ठीक चार दिन पूर्व आने वाला रमा एकादशी पर्व अपने आप में अत्यंत खास और फलदायी माना गया है, क्योंकि यह चातुर्मास की अंतिम एकादशी होती है। चातुर्मास के व्रत-नियमों का निष्ठापूर्वक समापन करने वाली इस एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति के संपूर्ण पाप कर्मों का क्षय होता है तथा उसे भौतिक जीवन में वैभव और मृत्यु उपरांत मोक्ष अथवा उत्तम लोक में स्थान प्राप्त होता है।
रमा एकादशी के दिन केवल भगवान विष्णु ही नहीं, बल्कि देवी लक्ष्मी और भगवान श्रीकृष्ण के विशेष मनमोहक स्वरूपों की आराधना का विधान है। देवराज इंद्र द्वारा रचित महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र के अनुसार, 'रमा' नाम भगवती लक्ष्मी के एकादश (11) प्रिय नामों में से एक है। इस दिन देवी लक्ष्मी के इसी रमा स्वरूप का पूजन किया जाता है, जिससे गृहस्थ जीवन में समृद्धि और वैभव का वास होता है।
इस तिथि पर भगवान विष्णु के आठवें पूर्णावतार भगवान श्रीकृष्ण के 'केशव' स्वरूप के पूजन का विशेष विधान है। शास्त्रों में वर्णित चित्रण के अनुसार, श्री कृष्ण का यह केशव स्वरूप अति सुंदर और मनमोहक है, जिसमें वे यौवन अवस्था में विराजमान हैं तथा उनके लंबे, घने व सुंदर केश (बाल) सुशोभित हैं।
Rama Ekadashi Vrat Katha रंभा एकादशी की पौराणिक व्रत कथा
शास्त्रों एवं पौराणिक संदर्भों में कार्तिक कृष्ण एकादशी को 'रंभा एकादशी' के नाम से भी संबोधित किया गया है। इसके पीछे एक अत्यंत रोचक एवं फलदायी पौराणिक कथा प्रचलित है। प्रचलित कथा के अनुसार, प्रतापी राजा मुचुकुंद की एक रूपवती कन्या थीं, जिनका नाम चंद्रभागा था। चंद्रभागा का विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र शोभन के साथ संपन्न हुआ। शोभन शारीरिक रूप से दुर्बल थे, परंतु विवाह के उपरांत वे भी अपनी पत्नी चंद्रभागा के साथ एकादशी का कठोर व्रत रखने लगे।
जब कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि आई, तो शोभन ने नियमपूर्वक व्रत का पालन किया। किंतु अत्यधिक भूख और शारीरिक क्षीणता के कारण व्रत के प्रभाव में शोभन की मृत्यु हो गई।
मृत्यु के पश्चात, रमा एकादशी व्रत के महान पुण्य प्रभाव से शोभन को मंदराचल पर्वत पर स्थित एक दिव्य देवनगरी में अत्यंत सुंदर और भव्य आवास प्राप्त हुआ। वहां उनकी सेवा-सुश्रूषा के लिए रंभा नामक अप्सरा तथा अन्य अप्सराएं जुटी रहती थीं, क्योंकि मान्यतानुसार रमा एकादशी के प्रभाव से मृत्यु उपरांत रंभादि अप्सराएं सेवा में उपस्थित रहती हैं। इसी पौराणिक घटना एवं रंभा अप्सरा के संबंध के कारण इस पावन तिथि को 'रंभा एकादशी' भी कहा जाता है।
Rama Ekadashi Puja Vidhi रमा एकादशी पूजन विधि
प्रातःकाल स्नान-ध्यान से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें और भगवान श्रीकृष्ण के केशव स्वरूप तथा माता लक्ष्मी के रमा रूप की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। भगवान केशव और देवी रमा का संपूर्ण उत्तम सामग्रियों से विधिवत पूजन करें। भगवान को सात्विक नैवेद्य अर्पित करें, आरती करें और तत्पश्चात श्रद्धालुओं में प्रसाद का वितरण करें। एकादशी व्रत के संपूर्ण पुण्य फल की प्राप्ति हेतु ब्राह्मणों को भोजन कराना अत्यंत उत्तम माना गया है।
Virtues of observing Rama Ekadashi fast रमा एकादशी व्रत पालन के पुण्य
दांपत्य कलह से शांति: यह एकादशी जीवन से दांपत्य कलह और पारिवारिक मतभेदों को समाप्त कर गृहस्थ में सुख-शांति लाती है।
पाप कर्मों से मुक्ति: साधक के अनजाने में हुए समस्त पाप कर्म नष्ट हो जाते हैं और जीवन में वैभव की प्राप्ति होती है।
मोक्ष की प्राप्ति: मृत्यु के पश्चात जीव को उत्तम लोक एवं मोक्ष पद प्राप्त होता है।

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