Sharad Purnima Vrat Katha : शरद पूर्णिमा पर जरूर पढ़ें यह कथा, मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु के आशीर्वाद से जुड़ी मान्यता

punjabkesari.in Saturday, Oct 24, 2026 - 04:37 PM (IST)

Sharad Purnima Vrat Katha : सनतान धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान के साथ पूजा-पाठ और व्रत करने से मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की कृपा  प्राप्त होती है। इस पावन तिथि पर चंद्रमा की पूजा करने और धार्मिक कथा सुनने और पढ़ने की परंपरा है। शरद पूर्णिमा से जुड़ी एक प्रचलित पौराणिक कथा में साहूकार की दो बेटियों का वर्णन मिलता है, जो पूर्णिमा का व्रत रखती थीं। उनकी व्रत करने की अलग-अलग विधि और उससे जुड़ी घटनाएं इस कथा के माध्यम से व्रत के नियमों, श्रद्धा और पूर्ण विधि-विधान के महत्व को समझाती हैं। आइए जानते हैं शरद पूर्णिमा की यह पौराणिक कथा।

Sharad Purnima Vrat Katha

शरद पूर्णिमा की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए एक साहूकार की दो बेटियां महीने में आने वाली हर पूर्णिमा को व्रत किया करती थी। इन दोनों बेटियों में बड़ी बेटी पूर्णिमा का व्रत पूरे विधि-विधान से किया करती थी। जबकि छोटी बेटी व्रत तो करती थी लेकिन नियमों में उस तरह से पालन नहीं करती थी। नियमों को आडंबर मानकर उनकी अनदेखी करती थी।

जैसी ही दोनों बेटी बड़ी हुई साहूकार ने दोनों दोनों बेटियों का विवाह कर दिया। बड़ी बेटी के घर समय पर स्वस्थ संतान का जन्म हुआ। छोटी बेटी को भी संतान हुई लेकिन, उसकी संतान जन्म लेती ही दम तोड़ देती थी। जब उसके साथ ऐसा दो से तीन बार हो गया तो उसने एक ब्राह्मण को बुलाकर अपनी पूरी व्यथा सुनाई साथ ही इसका उपाय बताने के लिए भी कहा। उसकी सारी बात सुनकर और कुछ प्रश्न पूछने के बाद ब्राह्मण ने उससे कहा कि तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती हो, इस कारण तुम्हे व्रत का पूरा फल नहीं मिल रहा है और तुम्हे अधूरे व्रत का दोष लगता है। ब्राह्मण की बात सुनकर छोटी बेटी ने पूर्णिमा व्रत पूरे विधि-विधान से करने का निर्णय लिया।

Sharad Purnima Vrat Katha

लेकिन पूर्णिमा आने से पहले ही उसने एक बेटे को जन्म दिया। जन्म लेते ही बेटे की मृत्यु हो गई। इस पर उसने अपने बेटे शव को एक पीढ़े पर रख दिया और ऊपर से एक कपड़ा इस तरह ढक दिया कि किसी को पता न चले। फिर उसने अपनी बड़ी बहन को बुलाया और बैठने के लिए वही पीढ़ा दे दिया। जैसे ही बड़ी बहन उस पीढ़े पर बैठने लगी, उसके लहंगे की किनारी बच्चे को छू गई और वह जीवित होकर तुरंत रोने लगा। इस पर बड़ी बहन पहले तो डर गई और फिर छोटी बहन पर क्रोधित होकर उसे डांटने लगी कि क्या तुम मुझ पर बच्चे की हत्या का दोष और कलंक लगाना चाहती हो! मेरे बैठने से यह बच्चा मर जाता तो?

इस पर छोटी बहन ने उत्तर दिया, यह बच्चा मरा हुआ तो पहले से ही था। दीदी, तुम्हारे तप और स्पर्श के कारण तो यह जीवित हो गया है। पूर्णिमा के दिन जो तुम व्रत और तप किया करती हो, उसके कारण तुम दिव्य तेज से परिपूर्ण और पवित्र हो गई हो। अब मैं भी तुम्हारी ही तरह व्रत और पूजन करूंगी। इसके बाद उसने पूर्णिमा व्रत विधि विधान से किया और इस व्रत के महत्व और फल का पूरे नगर में प्रचार किया। जिस प्रकार मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु ने साहूकार की बड़ी बेटी की कामना पूर्ण कर सौभाग्य प्रदान किया, वैसे ही हम पर भी कृपा करें।

Sharad Purnima Vrat Katha

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Content Editor

Sarita Thapa

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